Thursday, April 16, 2009

unknown

दिल में इश्क-ए-नबी की हो ऐसी लगन
रूह तड़पती रही दिल मचलता रहे
जिंदगी का मज़ा है के हर साँस से
या मुहम्मद मुहम्मद निकलता रहे
नूर के मोतियों की लड़ी बन गयी
आयतों से मिलाता रहा आयातेंं
फिर जो देखा तो नात-ए-नबी बन गयी
जो भी आंसू बहे मेरे महबूब के
सब के सब अब्र-ए-रहमत के छींटे बने
छा गयी रात जब ज़ुल्फ़ लहरा गयी
जब तबस्सुम किया चांदनी बन गयी
यह तो मान के ज़न्नत है बाग-ए-हसीन
खुबसूरत है सब खुलद की सर ज़मीन
हुस्न-ए-ज़न्नत को फिर जब समेटा गया
सरवर-ए-अंबिया की गली बन गयी
जब चीरा तज़किरा उनके रुखसार का
वदुहा पढ़ लिया, वल कमर कह दिया
सुआतों की तिलावत भी होती रही
नात भी हो गयी, बात भी बन गयी
सब से बेकस था, बेबस था, मजबूर था !
उनको रहम आ गया मेरे हालात पर !!
मेरी अजमत मेरी बेबसी बन गयी !!!
या मुहम्मद मुहम्मद मैं कहता रहा !!!!

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wel come