nikala mujhko zannat se
fareb-e-zindgi de kar..............
diya phir shaunq zannat ka ye hairani nahi jaati.......
Thursday, April 16, 2009
क्यूँ मुझे बंद कमरे में रौशनी की ख्वाहिश है? फिर तेरे जुल्म-ओ-सितम की आजमाइश है.. मैं भी ताउल्लुक रखता हूँ, इस सर-जमीं से न सोच कही और की मेरी पैदाइश है... गर राम को लगे चोट, दर्द अल्लाह को हो छोडो इसतिकराह[नफ़रत], यही दोनों की रिहाइश है
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