Tuesday, June 2, 2009

unknown

मैं उमर के रस्ते में चुप चाप बिखर जाता
एक दिन भी अगर अपनी तन्हाई से डर जाता
मैं तर्क-ए-ताल्लुक पर जिंदा हूँ सो मुजरिम हूँ
काश उस के लिए जीता, अपने लिए मर जाता
उस रात कोई खुशबू कुर्बत में नहीं जागी
मैं वरना संवर जाता, और वो भी निखर जाता
उस जान--तकल्लुम को तुम मुझसे तो मिलवाते
तश्कीर कर पाता, हैरान तो कर जाता
कल सामने मंजिल थी, पीछे मेरी आवाजें
चलता तो बिछड़ जाता, रुकता तो सफर जाता
मैं की रौनक में, गम हो के बोहत खुश था
इक शाम बचा लेता, इक रोज़ तो घर जाता
महरूम फिजाओं में, मायूस नज़रों में
तुम अजम नहीं ठहरे, मैं कैसे ठहर जाता

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