जो दर्द छुपा रखा था दुनिया की नज़र से
अब होने लगा सब पे अ'यान दीदा-ए-तर से
दीवानों को कब मौज-ए-ग़म-ए-दिल का कोई खौफ
तूफ़ान चला आए इधर से या उधर से
गैर आज भी इज्ज़त से हमें देख रहे हैं
अपनों ने गिराया है हमें अपनी नज़र से
वोह पाऊँ के छाले हो के हो राह के कांटे
सब हार के बैठे हैं मेरे अम्ज़-ए-सफर से
इक तू ही नहीं राह रव-ए-राह-ए-ग़म-ए-इश्क
गुज़रे हैं तेरे बाद भी कुछ लोग इधर से
ऐ बाद-ऐ-सबा इतना मेरे दोस्त से कह दे
आंखों को बिछाए है कोई पिछले पहर से
मैं अपनी ही मईयत पे खड़ा सोच रहा हूँ
ऐ काश निकलता यह जनाज़ा तेरे घर से
ऐ 'सादिक' किस तरह गुज़रे हैं शब्-ए-रोज़
पूछे कोई आ कर मेरी दीवारों से, दर से
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