Tuesday, June 2, 2009

unknown

थी फरिश्तों को भी हैरत, के ये आवाज़ है क्या !
अर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्या !
ता सर-ए-अर्श भी इन्सान की तग-ओ-ताज है क्या ?
आ गई खाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्या ?
गाफिल आदाब से ये सुकाम-ए-ज़मीन कैसे हैं !
शोख-ओ-गुस्ताख ये पस्ती के मकीं कैसे हैं !

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