Monday, June 1, 2009

unknown

न गिराओ अश्क भी आँख से, न लबों से निकल कराह भी
जो ज़मीन-ए-दिल में दबी रही, होई बर-अवर वोही आह ही
मेरा हाथ थम ले रहबर मुझे मंजिलों का पता नही
है बड़ी कठिन ये मुसफतें, बड़ी पेच-दार राह भी
जुबां पे सिकवे हो गिले, के बढ़ेंगे ऐसे तो फासले
जो अना बीच से जा सकी तो हो सकेगा निबाह भी
मैं भटक भटक के क़दम कदम फिरा हूँ तेरी ही तलाश में
मेरी दिल_गुदजी की कफियत मेरे प्यार की है गवाह भी
उससे जिंदगी की नवीद दे, जिसे मार डाला है हिज्र ने
दिल-ए-रेजा रेजा लिए हुए जो पड़े हैं चस्म-ऐ-बहार भी
कोई बद_गुमान ये कह न दे, है कहाँ जिसे थे पुकारते
करो बेबसी को न मुश्ताहिर, न आयान हो हाल-ए-तबाह भी
मेरी फर्द--जुर्म जो लिख रहे हैं फ़रिश्ते उंनसे ये अरज है
मेरी हसरतें भी शुमार हो, जो लिखें हैं मेरे गुनाह भी

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wel come