Thursday, April 16, 2009

taalib baghpati ki shayyiri

माना के मुहोब्बत का छुपाना भी है मुहोब्बत…
चुपके से कीसी रोज़ ये जताने के लिये आ…
.
जैसे तुज़े आते है ना आने के बहाने…
ऐसे ही किसी रोज़ ना जाने के लिये आ…
- तालिब़ बाग़पती

No comments:

Post a Comment

wel come