दर-ए-क़फ़स से परे जब सबा गुज़रती है
किसे ख़बर अस्वरों पे क्या गुज़रती है
तालूकात कभी इस कदर न टूटे थे
के तेरी याद भी दिल से ख़फा गुज़रती है
वो अब मिले भी तो मिलता है इस तरह जैसे
बुझे चिरागों को छू कर हवा गुज़रती है
ये अहल-ए-हिजर की बस्ती है इख्तियात से चल
मुसीबतों की यहाँ इंतेहा की गुज़रती है
भंवर से बच तो गयीं कश्तियाँ मगर अब के
दिलों की खैर के मौज-ए-बला गुज़रती है
न पूछ अपनी अना की बगावतें 'मोहसिन'
दर-ओ-कबूल से बच के दुआ गुज़रती है
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