जब नमाज़-ए-मुहब्बत अदा कीजिये
गैर को भी शरीक-ए-दुआ कीजिये
आँख वाले निगाहें चुराते हैं
आईना क्यूँ न हो सामना कीजिये
आँख में अश्क-ए-ग़म आ भी जाएँ तो क्या
चाँद कतरे तो हैं, पी लिया कीजिये
आप का घर सदा जगमगाता रहे
राह में भी दिया रख दिया कीजिये
ज़र-ए-पा हैं समंदर की गहराइयाँ
अब तो साहिल पे भी तजुरबा कीजिये
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