Tuesday, June 2, 2009

unknown

ग़म के मारों की अंधेरों में बसर होती है
शाम--ग़म की भी कहीं कोई सहर होती है
उसको भी ग़म की तरह दिल में ही दफनाते हैं
कुछ शिकायत हमें अपनों से अगर होती है
दिल बुझा रहता है मुफलिस के चरागों की तरह
अब इसी तरह हरिक शाम बसर होती है
जिस में कांटे भी बिछें मोड़ भी हर गाम पे आयें
हम मलंगों की वोही राहगुज़र होती है
अश्क जो जाते हैं तारीक शबों में रौशन
इन्ही अश्कों के सहारे तोह बसर होती है
इक मुसाफिर भी अगर साए से महरूम रहे
ऐ शजर ! इस में भी तौहीन-ऐ-शजर होती है
किस ने कब कैसे गुज़री हैं शबें रो रो कर
'दिल' इसकी कहाँ उनको ख़बर होती है

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