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Sunday, May 31, 2009

faraz ki shayyiri

अब और क्या किसी से मरासिम बढायें हम
ये भी बोहत है, तुझे भूल जाएँ हम
सेहरा-ए-जिंदगी में कोई दूसरा न था
सुनते रहे हैं आप ही अपनी सदाएँ हम
इस जिंदगी में इतनी फरागत किसे नसीब
इतना न याद आ के तुझे भूल जाएँ हम
तू इतनी दिलज़दा तो न थी ऐ शब्-ए-फिराक
आ तेरे रास्ते में सितारे लौटाएं हम
वोह लोग अब कहाँ हैं जो कह्ते थे कल 'फ़रज़'
ऐ ऐ खुदा न करना तुझे भी रुलाएँ हम

Friday, May 29, 2009

faraz ki shayyiri

अब्र-ऐ-बहार अब के भी बरसा परे परे
गुलशन उजाड़ उजाड़ हैं, जंगल हरे हरे
जाने ये तिशनगी है हवास है के खुदकुशी
जलते हैं शाम ही से जो सागर भरे भरे
है दिल की मौत अहद-ए-वफ़ा की शिकस्तगी
फिर भी जो कोई तर्क-ऐ-मुहब्बत करे, करे
अब अपना दिल भी शा’र-ऐ-खामोशां से कम नहीं
सून हो गए हैं कान सदा पर धरे धरे
रहते हैं अहल-ए-शहर के साए से दूर दूर
हम आहवान-ऐ-दस्त की सूरत, डरे डरे
गुल बन के फुटा है लहू शाख-सार से
ज़ख्म-ऐ-राग-ऐ-बहार हैं पत्ते हरे हरे
जिंदा-दिलां-ए-शहर को क्या हो गया 'फ़रज़'
आँखें बुझी बुझी हैं तोह चेहरे मरे मरे

wel come