ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरी
ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा
तू जो ऐ जुल्फ-ए-परेशां रहा करती है
किस के उजडे हुए दिल में है ठिकाना तेरा
अपनी आंखों में अभी कौंध गई बिजली सी
हम न समझे की ये आना है के जाना तेरा
तू खुदा तो नही ऐ नशे नादान मेरा
क्या खता की, जो कहा मैंने न माना तेरा
ये समझ कर तुझे, ऐ मौत, गले लगा रखा है
काम आता है बुरे वक्त में आना तेरा
'दाग' को यूँ वो मिटते हैं, ये फरमाते हैं
तू बदल डाल हुआ नाम पुराना तेरा
nikala mujhko zannat se fareb-e-zindgi de kar.............. diya phir shaunq zannat ka ye hairani nahi jaati.......
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Tuesday, June 2, 2009
Monday, June 1, 2009
Saturday, May 30, 2009
"Daag" ki shayyiri
आरजू-ऐ-वफ़ा करे कोई
जी न चाहे तोह क्या करे कोई
गर मर्ज़ हो दावा करे कोई
मरने_वाले का क्या करे कोई
कोसते हैं जले हुए क्या क्या
अपने हक में दूआ करे कोई
उंनसे सब अपनी अपनी कह्ते हैं
मेरा मतलब अदा करे कोई
चाह से आप को तोह नफरत है
मुझको चाहे खुदा करे कोई
यह मिली दाद रंज-ऐ-फुर्क़त की
और दिल का कहा करे कोई
तुम सरापा हो सूरत-ऐ-तस्वीर
तुम से फिर बात क्या करे कोई
कह्ते हैं हम नहीं खुदा-ए-करीम
क्यों हमारी खता करे कोई
मुँह लगते ही 'दाग' इतराया
लुत्फ़ है फिर जफ्फा करे कोई
जी न चाहे तोह क्या करे कोई
गर मर्ज़ हो दावा करे कोई
मरने_वाले का क्या करे कोई
कोसते हैं जले हुए क्या क्या
अपने हक में दूआ करे कोई
उंनसे सब अपनी अपनी कह्ते हैं
मेरा मतलब अदा करे कोई
चाह से आप को तोह नफरत है
मुझको चाहे खुदा करे कोई
यह मिली दाद रंज-ऐ-फुर्क़त की
और दिल का कहा करे कोई
तुम सरापा हो सूरत-ऐ-तस्वीर
तुम से फिर बात क्या करे कोई
कह्ते हैं हम नहीं खुदा-ए-करीम
क्यों हमारी खता करे कोई
मुँह लगते ही 'दाग' इतराया
लुत्फ़ है फिर जफ्फा करे कोई
Sunday, May 10, 2009
"Daag" ki shayyiri
ज़माना बहुत बदगुमान हो रहा है
किसी शख्स का इम्तिहान हो रहा है
सुरीली सदायें हैं एक शोख सी कि
इलाही ! ये जलसा कहाँ हो रहा है
बहुत हसरत आती है मुझको ये सुनकर
किसी पर कोई मेहरबान हो रहा है
तेरे ज़ुल्म-ए-पिन्हाँ अभी कौन जाने ?
फ़क़त आसमान आसमान हो रहा है
इन आँखों ने इस दिल का कया भेद खोला ?
कि मुज़्तर मेरा राजदां हो रहा है
सुनूँ कया खबर जशन-ए-इशरत का कासिद ?
जहाँ हो रहा है वहां हो रहा है
वो हाल-ए-तबियात जो बरसों छुपाया
हर एक शख्स से अब बयान हो रहा है
कोई उड़ के आया, कोई छुप के आया
पशेमान तेरा पासबान हो रहा है
कहीं दो घड़ी आप शबनम में सोये
जो रुख पर अर्क दुर्-फिशां हो रहा है
ये बेहोशियाँ 'दाग' ये खवाब-ए-गल्फ्लत
खबर भी है जो कुछ वहां हो रहा है
किसी शख्स का इम्तिहान हो रहा है
सुरीली सदायें हैं एक शोख सी कि
इलाही ! ये जलसा कहाँ हो रहा है
बहुत हसरत आती है मुझको ये सुनकर
किसी पर कोई मेहरबान हो रहा है
तेरे ज़ुल्म-ए-पिन्हाँ अभी कौन जाने ?
फ़क़त आसमान आसमान हो रहा है
इन आँखों ने इस दिल का कया भेद खोला ?
कि मुज़्तर मेरा राजदां हो रहा है
सुनूँ कया खबर जशन-ए-इशरत का कासिद ?
जहाँ हो रहा है वहां हो रहा है
वो हाल-ए-तबियात जो बरसों छुपाया
हर एक शख्स से अब बयान हो रहा है
कोई उड़ के आया, कोई छुप के आया
पशेमान तेरा पासबान हो रहा है
कहीं दो घड़ी आप शबनम में सोये
जो रुख पर अर्क दुर्-फिशां हो रहा है
ये बेहोशियाँ 'दाग' ये खवाब-ए-गल्फ्लत
खबर भी है जो कुछ वहां हो रहा है
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