ऐसे हिज्र के मौसम अब कब आते हैं
तेरे इलावा याद हमे सब आते हैं
जज़ब करे क्यों रेत हमारे अश्कों को
तेरा दामन तर करने अब आते हैं
अब वो सफर की ताब नही बाकी वरना
हमको बुलावे दस्त से जब तब आते हैं
जागती आंखों से भी देखो दुनिया को
ख्वाबों का क्या है, वो हर शब् आते हैं
कागज़ की कश्ती में दरिया पार किया
देखो हमको क्या-क्या करतब आते हैं
nikala mujhko zannat se fareb-e-zindgi de kar.............. diya phir shaunq zannat ka ye hairani nahi jaati.......
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Friday, May 29, 2009
shaharyar ki shayyiri
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नही मिलता
कहीं ज़मीन तोह कहीं असमान नही मिलता
जिसे भी देखिये वो अपने आप में गम है
जुबां मिली है मगर हम-ज़ुबाँ नही मिलता
बुझा सका है भला कौन वक्त के शोले
ये ऐसी आग है जिसमे धुंआ नही मिलता
तेरे जहाँ में ऐसा नही की प्यार न हो
जहाँ उम्मीद हो इसकी, वहां नही मिलता
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