Showing posts with label सिकंदर. Show all posts
Showing posts with label सिकंदर. Show all posts

Saturday, May 30, 2009

sikandar ki shayyiri

कितने दिन बीत गए हैं देखो तोह सही
कितने चिराग बुझ गए हैं देखो तोह सही
मौषम बहार का फिर तन्हा गुज़र गया
खिज़ाँ एक बर फिर आ गई है देखो तोह सही
कितनी चाहत से लिखती थी मैं नाम तुम्हारा
वो कलम ही तोड़ दिया है ज़रा देखो तोह सही
इतनी आसानी से तोह मिलती नही नफरत भी लेकिन
तुमने हासिल_शुदा प्यार ठुकरा दिया देखो तोह सही
आंचल में अपने छुपाये थे मोती बोहत
अब के ज़ब्त टूटने से सैलाब रवां है देखो तोह सही
अना रोकती है मुझे हर बार झुकने से मगर
कितनी बार तुमने झुकाया है देखो तोह सही
फकीर बन कर तेरे कूचे में आ कर 'सिकंदर'
कितनी आस से देखते हैं तुम्हे देखो तोह सही

wel come