हुस्न जब मेहरबान हो तो कया कीजिये
इश्क की मगफिरत की दुआ कीजिये
इस सलीके से उन्से गिला कीजिये
जब गिला कीजिये हँस दिया कीजिये
दुसरो पे अगर तबसिरा कीजिये
सामने आइना रख लिया कीजिये
आप सुख से हैं तरक-ए-तालुक के बाद
इतनी जल्दी ना ये फैसला कीजिये
कोई धोखा न खा जाये मेरी तरह
ऐसे खुल के न सब से मिला कीजिये
अक्ल-ओ-दील अपनी अपनी कहें जब "खुमार"
अक्ल की सुनिए दील की कहा कीजिये
nikala mujhko zannat se fareb-e-zindgi de kar.............. diya phir shaunq zannat ka ye hairani nahi jaati.......
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Sunday, June 7, 2009
Thursday, June 4, 2009
khumar barabanqwi ki shayyiri
ग़म-ए-जानां को ग़म जाने हुए हैं
खिरद वाले भी दीवाने हुए हैं
इधर आ ऐ खुशी, ऐ मुखबिर-ए-ग़म
तुझे हम खूब पहचाने हुए हैं
बहुत खुश हैं मेरी गुस्ताखिओं पर
बा-ज़ाहिर जो बुरा माने हुए हैं
खुदा समझाने वालों से बचाये
हम अब सचमुच ही दीवाने हुए हैं
मैं नावाकिफ नहीं दैर-ओ-हरम से
ये वीराने मेरे छाने हुए हैं
खड़े हैं मय-कदे के दर पे जाहिद
न जाने दिल में क्या ठाने हुए हैं
'खुमार' इस दौर में ज़िक्र-ए-मुहब्बत
यकीनन आप दीवाने हुए हैं
खिरद वाले भी दीवाने हुए हैं
इधर आ ऐ खुशी, ऐ मुखबिर-ए-ग़म
तुझे हम खूब पहचाने हुए हैं
बहुत खुश हैं मेरी गुस्ताखिओं पर
बा-ज़ाहिर जो बुरा माने हुए हैं
खुदा समझाने वालों से बचाये
हम अब सचमुच ही दीवाने हुए हैं
मैं नावाकिफ नहीं दैर-ओ-हरम से
ये वीराने मेरे छाने हुए हैं
खड़े हैं मय-कदे के दर पे जाहिद
न जाने दिल में क्या ठाने हुए हैं
'खुमार' इस दौर में ज़िक्र-ए-मुहब्बत
यकीनन आप दीवाने हुए हैं
khumar barabanqwi ki shayyiri
हम उन्हें वो हमें भुला बैठे
दो गुनाहगार ज़हर खा बैठे
हाल-ए-ग़म कह के ग़म बढ़ा बैठे
तीर मारे थे तीर खा बैठे
आंधियों जाओ अब करो आराम
हम ख़ुद अपना दिया बुझा बैठे
जी तो हल्का हुआ मगर यारों
रो के लुत्फ़-ए-ग़म गँवा बैठे
बे-सहारों का हौसला ही क्या
घर में घबराए, दर पे आ बैठे
उठ के एक बेवफा ने दे दी जान
रह गए सारे बा-वफ्फा बैठे
जब से बिच्च्दे वो, मुस्कुराए न हम
सब ने छेड़ा तो लब हिला बैठे
हश्र का दिन अभी है दूर 'खुमार'
आप क्यूँ जाहिदों में जा बैठे
दो गुनाहगार ज़हर खा बैठे
हाल-ए-ग़म कह के ग़म बढ़ा बैठे
तीर मारे थे तीर खा बैठे
आंधियों जाओ अब करो आराम
हम ख़ुद अपना दिया बुझा बैठे
जी तो हल्का हुआ मगर यारों
रो के लुत्फ़-ए-ग़म गँवा बैठे
बे-सहारों का हौसला ही क्या
घर में घबराए, दर पे आ बैठे
उठ के एक बेवफा ने दे दी जान
रह गए सारे बा-वफ्फा बैठे
जब से बिच्च्दे वो, मुस्कुराए न हम
सब ने छेड़ा तो लब हिला बैठे
हश्र का दिन अभी है दूर 'खुमार'
आप क्यूँ जाहिदों में जा बैठे
Saturday, May 30, 2009
khumar barabanqwi ki shayyiri
ऐसा नही के उंनसे मुहब्बत नही रही
जज्बात में वो पहली से शिद्दत नही रही
सर में वो इंतज़ार की हिम्मत नही रही
दिल पर वो धधकनों की हकुमत नही रही
पैहम तवाफ़-ए-कूचा-ए-जाना के दिन गये
पैरों में चलने फिरने की ताक़त नही रही
चेहरे की झुरियों ने भयनक बना दिया
आईना देखने की भी हिम्मत नही रही
कमजोरी-ए-निगाह ने संजीदा कर दिया
जलवों से छेड़-छड़ की आदत नही रही
अल्लाह जाने मौत कहाँ मार गई 'खुमार'
अब मुझको ज़िन्दगी की ज़ुरूरत नही रही
जज्बात में वो पहली से शिद्दत नही रही
सर में वो इंतज़ार की हिम्मत नही रही
दिल पर वो धधकनों की हकुमत नही रही
पैहम तवाफ़-ए-कूचा-ए-जाना के दिन गये
पैरों में चलने फिरने की ताक़त नही रही
चेहरे की झुरियों ने भयनक बना दिया
आईना देखने की भी हिम्मत नही रही
कमजोरी-ए-निगाह ने संजीदा कर दिया
जलवों से छेड़-छड़ की आदत नही रही
अल्लाह जाने मौत कहाँ मार गई 'खुमार'
अब मुझको ज़िन्दगी की ज़ुरूरत नही रही
Friday, May 29, 2009
khumar barabanqwi ki shayyiri
तेरे दर से उठ कर जिधर जाऊं मैं
चलूँ दो क़दम और ठहर जाऊं मैं
अगर तू ख़फा तोह परवाह नहीं
तेरा ग़म ख़फा हो तोह मर जाऊं मैं
तबस्सुम ने इतना डशा है मुझे
कली मुस्कुराये तोह डर जाऊं मैं
संभाले तोह हूँ ख़ुद को तुझ बिन मगर
जो छू ले कोई तोह बिखर जाऊं मैं
चलूँ दो क़दम और ठहर जाऊं मैं
अगर तू ख़फा तोह परवाह नहीं
तेरा ग़म ख़फा हो तोह मर जाऊं मैं
तबस्सुम ने इतना डशा है मुझे
कली मुस्कुराये तोह डर जाऊं मैं
संभाले तोह हूँ ख़ुद को तुझ बिन मगर
जो छू ले कोई तोह बिखर जाऊं मैं
khumar barabanqwi ki shayyiri
न हारा है इश्क और न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है हवा चल रही है
सुकून ही सुकून है, खुशी ही खुशी है
तेरा ग़म सलामत मुझे क्या कमी है
वो मौजूद हैं और उनकी कमी है
मुहब्बत भी तन्हाई-ए-दाइमीं है
खटक गुदगुदी का मज़ा दे रही है
जिसे इश्क कह्ते हैं शायद यही है
चरागों के बदले मकान जल रहे हैं
नया है ज़माना, नई रौशनी है
ज़फाओं पे घुट घुट के चुप रहने वालो
खामोशी जफ्फओं की ताईद भी है
मेरे राहबर मुझको गम-राह कर दे
सुना है के मंजिल करीब आ गई है
'खुमार'-ऐ-बालानोश तू और तौबा
तुझे जाहिदों की नज़र लग गई है
दिया जल रहा है हवा चल रही है
सुकून ही सुकून है, खुशी ही खुशी है
तेरा ग़म सलामत मुझे क्या कमी है
वो मौजूद हैं और उनकी कमी है
मुहब्बत भी तन्हाई-ए-दाइमीं है
खटक गुदगुदी का मज़ा दे रही है
जिसे इश्क कह्ते हैं शायद यही है
चरागों के बदले मकान जल रहे हैं
नया है ज़माना, नई रौशनी है
ज़फाओं पे घुट घुट के चुप रहने वालो
खामोशी जफ्फओं की ताईद भी है
मेरे राहबर मुझको गम-राह कर दे
सुना है के मंजिल करीब आ गई है
'खुमार'-ऐ-बालानोश तू और तौबा
तुझे जाहिदों की नज़र लग गई है
Monday, November 24, 2008
khumar barabanqwi ki shayyiri
हुस्न जब मेहरबान हो तो कया कीजिये
इश्क की मगफिरत की दुआ कीजिये
इस सलीके से उन्से गिला कीजिये
जब गिला कीजिये हँस दिया कीजिये
दुसरो पे अगर तबसिरा कीजिये
सामने आइना रख लिया कीजिये
आप सुख से हैं तरक-ए-तालुक के बाद
इतनी जल्दी ना ये फैसला कीजिये
कोई धोखा न खा जाये मेरी तरह
ऐसे खुल के न सब से मिला कीजिये
अक्ल-ओ-दील अपनी अपनी कहें जब "खुमार"
अक्ल की सुनिए दील की कहा कीजिये
इश्क की मगफिरत की दुआ कीजिये
इस सलीके से उन्से गिला कीजिये
जब गिला कीजिये हँस दिया कीजिये
दुसरो पे अगर तबसिरा कीजिये
सामने आइना रख लिया कीजिये
आप सुख से हैं तरक-ए-तालुक के बाद
इतनी जल्दी ना ये फैसला कीजिये
कोई धोखा न खा जाये मेरी तरह
ऐसे खुल के न सब से मिला कीजिये
अक्ल-ओ-दील अपनी अपनी कहें जब "खुमार"
अक्ल की सुनिए दील की कहा कीजिये
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