हिजाबों में भी तू नुमायाँ नुमायाँ
फरोजां फरोजां दरख्शां दरख्शां
तेरे जुल्फ-ओ-रुख का बदल ढूंढता हूँ
शबिस्तान शबिस्तान चिरागां चिरागां
ख़त-ओ-खाल की तेरे परछाईयाँ हैं
खायाबान खायाबान गुलिस्तान गुलिस्तान
जूनून-ए-मुहब्बत उन् आँखों की वहशत
बयबां बयबां गजालां गजालां
लपट मुश्क-ए-गेसू की तातार तातार
दमक ला'ल-ए-लब की बदकशाँ बदकशाँ
वही एक तबस्सुम चमन दर चमन है
सरासर है तस्वीर जमीतों की
मुहब्बत की दुनिया हरासाँ हरासाँ
यही जज्ब-ए-पिन्हाँ की है दाद काफ़ी
चले आओ मुझ तक गुरेज़ाँ गुरेज़ाँ
'फिराक' खाजीन से तो वाकिफ थे तुम भी
वो खुछ खोया खोया परेशां परेशां
nikala mujhko zannat se fareb-e-zindgi de kar.............. diya phir shaunq zannat ka ye hairani nahi jaati.......
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Thursday, June 4, 2009
Monday, June 1, 2009
firaq gorkhpuri ki shayyiri
फर्श-ऐ-मैखाना पे जुगनू से चमक जाते हैं
दीदानी[worth seeing] है तेरी आहिस्ता-रावि[walking slowly], ऐ साकी !
दीदानी[worth seeing] है तेरी आहिस्ता-रावि[walking slowly], ऐ साकी !
firaq gorkhpuri ki shayyiri
कभी जब तेरी याद आ जाए है
दिलों पर घटा बन के छा जाए है
शब्-ऐ-यास में कौन छुप कर नदीम[दोस्त] मेरे हाल पर मुसकुरा जाए है
मुहब्बत में ऐ मौत-ए-जिदंगी मरा जाए है या जीया जाए है
पलक पर पासे-तरके-ग़म[दुःख के आंसू] घाः-घाः सितारा कोई झिलमिला जाए है
तेरी याद शबः-ए-बे_ख्वाब में सितारों की दुनिया बसा जाए है
जो बे_ख्वाब रखे है ता_जिंदगी वही ग़म किसी दिन सुला जाए है
न सुन मुझसे हमदम मेरा हाल-ए-जार दिले-नातवां सनसना जाए है
ग़ज़ल मेरी खींचे है ग़म की शराब पीये है वो जिस से पिया जाए है
मेरी शायरी जो है जाने-नशात ग़मों के खजाने लुटा जाए है
मुझे छोड़ कर जाए है तेरी याद की जीने का एक आसरा जाए है
मुझे गुमराही का नही कोई खौफ तेरे घर को हर रास्ता जाए है
सुनाएँ तुम्हें दास्ताँ-ऐ-'फिराक'
मगर कब किसी से सुनी जाए है
दिलों पर घटा बन के छा जाए है
शब्-ऐ-यास में कौन छुप कर नदीम[दोस्त] मेरे हाल पर मुसकुरा जाए है
मुहब्बत में ऐ मौत-ए-जिदंगी मरा जाए है या जीया जाए है
पलक पर पासे-तरके-ग़म[दुःख के आंसू] घाः-घाः सितारा कोई झिलमिला जाए है
तेरी याद शबः-ए-बे_ख्वाब में सितारों की दुनिया बसा जाए है
जो बे_ख्वाब रखे है ता_जिंदगी वही ग़म किसी दिन सुला जाए है
न सुन मुझसे हमदम मेरा हाल-ए-जार दिले-नातवां सनसना जाए है
ग़ज़ल मेरी खींचे है ग़म की शराब पीये है वो जिस से पिया जाए है
मेरी शायरी जो है जाने-नशात ग़मों के खजाने लुटा जाए है
मुझे छोड़ कर जाए है तेरी याद की जीने का एक आसरा जाए है
मुझे गुमराही का नही कोई खौफ तेरे घर को हर रास्ता जाए है
सुनाएँ तुम्हें दास्ताँ-ऐ-'फिराक'
मगर कब किसी से सुनी जाए है
firaq gorkhpuri ki shayyiri
मैं होश-ऐ-अनादिल[बुलबुल की nature] हूँ मुश्किल है संभल जाना
ऐ बाद-ए-सबा मेरी करवट तो बदल जाना
तकदीर-ए-मुहब्बत हूँ मुश्किल है बदल जाना
सौ बार संभल कर भी मालुम संभल जाना
उस आँख की मस्ती हूँ ऐ बदकशो[शारबी] जिसका
उठ कर सर-ए-मय-खाना मुमकिन है बदल जाना
अय्याम-ए-बहारां में दीवानों के तेवर भी
जिस सम्त नज़र उठी आलम का बदल जाना
घनघोर घटाओं में सरशार फिजाओं में
मखमूर हवाओं में मुश्किल है संभल जाना
हूँ लग्ज़िशें मस्ताना[लडखडाना] मैखाना-ए-आलम में
बर्क़-ए-निगाह-ए-साकी कुछ बच के निकल जाना
इस गुलशन-ए-हस्ती में कम खिलते हैं गुल ऐसे
दुनिया महक उठेगी तुम दिल को मसल जाना
मैं साज-ऐ-हकीक़त हूँ सोया हुआ नगमा था
था राज़-ए-निहा कोई परदों से निकल जाना
हूँ नखत-ए-मस्ताना गुलज़ार-ए-मुहब्बत में
मदहोश-ए-आलम है पहलु का बदल जाना
मस्ती में लगावत से उस आँख का ये कहना
मय_खवर की नियत हूँ मुमकिन है बदल जाना
जो तर्ज़-ए-ग़ज़ल_गोई मोमिन ने तरह की थी
साद-हैफ 'फिराक' उसका सद-हैफ बदल जाना
ऐ बाद-ए-सबा मेरी करवट तो बदल जाना
तकदीर-ए-मुहब्बत हूँ मुश्किल है बदल जाना
सौ बार संभल कर भी मालुम संभल जाना
उस आँख की मस्ती हूँ ऐ बदकशो[शारबी] जिसका
उठ कर सर-ए-मय-खाना मुमकिन है बदल जाना
अय्याम-ए-बहारां में दीवानों के तेवर भी
जिस सम्त नज़र उठी आलम का बदल जाना
घनघोर घटाओं में सरशार फिजाओं में
मखमूर हवाओं में मुश्किल है संभल जाना
हूँ लग्ज़िशें मस्ताना[लडखडाना] मैखाना-ए-आलम में
बर्क़-ए-निगाह-ए-साकी कुछ बच के निकल जाना
इस गुलशन-ए-हस्ती में कम खिलते हैं गुल ऐसे
दुनिया महक उठेगी तुम दिल को मसल जाना
मैं साज-ऐ-हकीक़त हूँ सोया हुआ नगमा था
था राज़-ए-निहा कोई परदों से निकल जाना
हूँ नखत-ए-मस्ताना गुलज़ार-ए-मुहब्बत में
मदहोश-ए-आलम है पहलु का बदल जाना
मस्ती में लगावत से उस आँख का ये कहना
मय_खवर की नियत हूँ मुमकिन है बदल जाना
जो तर्ज़-ए-ग़ज़ल_गोई मोमिन ने तरह की थी
साद-हैफ 'फिराक' उसका सद-हैफ बदल जाना
firaq gorkhpuri ki shayyiri
दौर-ए-अफ्लाक का शबाब है तू
अफ्ताबों का आफताब है तू
रूप ऐसा हसीन जैसे गुनाह
खल्क का हासिल-ऐ-सवाब है तू
तुझसे जोबन उजाली रातों का
मह्ताबों का महताब है तू
और जेरे-शफक चिरागां हो
आज यूँ मयिले-हिजाब है तू
ये सितारे तेरे पसीने के
शब् का दहका हुआ शबाब है तू
तू जो सूरत पकड़ ले है वो ख्याल
याक-ब-याक जाग उठे वो ख्वाब है तू
जो बहारों के दिल से उठते हैं
उन्न्हीं शोलों का पेचो-ताब है तू
आँख पड़ती है एक ज़माने की
बज्म-ऐ-इमकान में इंतेखाब है तू
जैसे नग्मे-लब-ऐ-'फिराक' पा' सोया
सेज पर यूँ यूँ ही महव-ख्वाब है तू
अफ्ताबों का आफताब है तू
रूप ऐसा हसीन जैसे गुनाह
खल्क का हासिल-ऐ-सवाब है तू
तुझसे जोबन उजाली रातों का
मह्ताबों का महताब है तू
और जेरे-शफक चिरागां हो
आज यूँ मयिले-हिजाब है तू
ये सितारे तेरे पसीने के
शब् का दहका हुआ शबाब है तू
तू जो सूरत पकड़ ले है वो ख्याल
याक-ब-याक जाग उठे वो ख्वाब है तू
जो बहारों के दिल से उठते हैं
उन्न्हीं शोलों का पेचो-ताब है तू
आँख पड़ती है एक ज़माने की
बज्म-ऐ-इमकान में इंतेखाब है तू
जैसे नग्मे-लब-ऐ-'फिराक' पा' सोया
सेज पर यूँ यूँ ही महव-ख्वाब है तू
firaq gorkhpuri ki shayyiri
कुछ भी अयाँ-निहाँ[सामने-गुप्त] ना था, कोई ज़मां मकान ना था
देर थी इक निगाह की फिर ये जहाँ ना था
साज़ वो कतरे-कतरे में सोज़ वो ज़र्रे ज़र्रे में
याद तेरी किसे ना थी दर्द तेरा कहाँ ना था
इश्क की अज्मायिशें और फिजाओं में हुई
पाँव तले ज़मीन ना थी सर पे ये आसमां ना था
सोज़-ए-निहाँ में वो करार कल्बे-तपाँ में वो सफा[पवित्र]
शोला तो था तड़प ना थी आग तो थी धुँआ ना था
इश्क हरीमे-हुस्न में अपने सहारे रह गया
सब्र का भी पता ना था होश का भी निशां ना था
किसके हवास से बजा कौन था अपने होश में
वक़्ते-बयाने-ग़म कोई मयाल-ए-दास्तान ना था
देख फजा-ए-दहर को कैफ-ए-अदम से भर दिया
ऐ दिल-ए-दर्द_आशना मिट ke भी मैं कहाँ ना था
जलवा-ए-ताबज्मा खयाले-इश्क हो गया
थी ना सदा-ए-अल्हज़र[दर की पुकार] नारा-ए-अलमान ना था
एक को एक की खबर मंजिल-ए-इश्क में ना थी
कोई भी अहले-कारवां शामिल-कारवां ना था
गफ़्लते-हुस्न जाग उठी और ज़बाने-इश्क पर
आह ना थी फुगाँ ना था नारा-ए-अलामत ना था
खिल्वातें-राज़ से हाले-विसाले-यार पूछ
हुस्न भी बेनकाब था इश्क भी दरमियाँ ना था
अब ना वो पुरसिशे-करम अब बा वो चश्म-आशना
शिकवा-ए-इश्क बर्तारफ तुमसे तो ये गुमां ना था
शिकवा-ए-दरगुज़र_नुमा क्यूँ है की हुस्न-इश्क से
इतना तो बदगुमान ना था इतना तो सरगराँ ना था
तेरी ख़ुशी की याद राखी तेरी कुशी की भूल जा
तुझसे ज़रा भी बदगुमान आलमे-रफतगाँ ना था
सब्र -ओ-सकून के राज़ कुछ बातों में खुल गये मगर
इश्क को भी ख़ुशी ना थी हुस्न भी शादमां ना था
फिर भी सकूने-इश्क पर आँख भर आई बारहा
गो गमे-हिज़र भी 'फिराक' कुछ गमे-जाविनदाँ ना था
देर थी इक निगाह की फिर ये जहाँ ना था
साज़ वो कतरे-कतरे में सोज़ वो ज़र्रे ज़र्रे में
याद तेरी किसे ना थी दर्द तेरा कहाँ ना था
इश्क की अज्मायिशें और फिजाओं में हुई
पाँव तले ज़मीन ना थी सर पे ये आसमां ना था
सोज़-ए-निहाँ में वो करार कल्बे-तपाँ में वो सफा[पवित्र]
शोला तो था तड़प ना थी आग तो थी धुँआ ना था
इश्क हरीमे-हुस्न में अपने सहारे रह गया
सब्र का भी पता ना था होश का भी निशां ना था
किसके हवास से बजा कौन था अपने होश में
वक़्ते-बयाने-ग़म कोई मयाल-ए-दास्तान ना था
देख फजा-ए-दहर को कैफ-ए-अदम से भर दिया
ऐ दिल-ए-दर्द_आशना मिट ke भी मैं कहाँ ना था
जलवा-ए-ताबज्मा खयाले-इश्क हो गया
थी ना सदा-ए-अल्हज़र[दर की पुकार] नारा-ए-अलमान ना था
एक को एक की खबर मंजिल-ए-इश्क में ना थी
कोई भी अहले-कारवां शामिल-कारवां ना था
गफ़्लते-हुस्न जाग उठी और ज़बाने-इश्क पर
आह ना थी फुगाँ ना था नारा-ए-अलामत ना था
खिल्वातें-राज़ से हाले-विसाले-यार पूछ
हुस्न भी बेनकाब था इश्क भी दरमियाँ ना था
अब ना वो पुरसिशे-करम अब बा वो चश्म-आशना
शिकवा-ए-इश्क बर्तारफ तुमसे तो ये गुमां ना था
शिकवा-ए-दरगुज़र_नुमा क्यूँ है की हुस्न-इश्क से
इतना तो बदगुमान ना था इतना तो सरगराँ ना था
तेरी ख़ुशी की याद राखी तेरी कुशी की भूल जा
तुझसे ज़रा भी बदगुमान आलमे-रफतगाँ ना था
सब्र -ओ-सकून के राज़ कुछ बातों में खुल गये मगर
इश्क को भी ख़ुशी ना थी हुस्न भी शादमां ना था
फिर भी सकूने-इश्क पर आँख भर आई बारहा
गो गमे-हिज़र भी 'फिराक' कुछ गमे-जाविनदाँ ना था
firaq gorkhpuri ki shayyiri
किसी से छूट के शाद और किसी से मिल के ग़मगीन
'फिराक' तेरी मुहब्बत का कोई ठिकाना नहीं
यूँ-ही-सा था कोई जिसने मुझे मिटा डाला
न कोई नूर का पुतला न कोई जोहरा-जबीं
जो भूलती भी नहीं याद भी नहीं आती
तेरी निगाह ने क्यूँ वो कहानियाँ न कही
लबे-निगार है या नगमा-ए-बहार की लौ
सुकूते-नाज़ है या कोई मुत्रिबे-रंगीन[beauty lover singar]
शुरू-ए-जिंदगी-ए-इश्क का वो पहला ख्वाब
तुम्हें भी भुला चुका है मुझे भी याद नहीं
हज़ार शुक्र की मायूस कर दिया तुने
ये और बात की तुझसे बड़ी उमीदें थीं
अगर बदल न दिया आदमी ने दुनिया को तो
जान लो की यहाँ आदमी की खैर नहीं
हुनर तो खैर हुनर ऐब से भी जलते हैं
फुगाँ[आह] की अहल-ऐ-ज़माना है किस कदर कम्बीन[अदूरदर्शी]
'फिराक' तेरी मुहब्बत का कोई ठिकाना नहीं
यूँ-ही-सा था कोई जिसने मुझे मिटा डाला
न कोई नूर का पुतला न कोई जोहरा-जबीं
जो भूलती भी नहीं याद भी नहीं आती
तेरी निगाह ने क्यूँ वो कहानियाँ न कही
लबे-निगार है या नगमा-ए-बहार की लौ
सुकूते-नाज़ है या कोई मुत्रिबे-रंगीन[beauty lover singar]
शुरू-ए-जिंदगी-ए-इश्क का वो पहला ख्वाब
तुम्हें भी भुला चुका है मुझे भी याद नहीं
हज़ार शुक्र की मायूस कर दिया तुने
ये और बात की तुझसे बड़ी उमीदें थीं
अगर बदल न दिया आदमी ने दुनिया को तो
जान लो की यहाँ आदमी की खैर नहीं
हुनर तो खैर हुनर ऐब से भी जलते हैं
फुगाँ[आह] की अहल-ऐ-ज़माना है किस कदर कम्बीन[अदूरदर्शी]
Friday, May 29, 2009
firaq gorkhpuri ki shayyiri
हरी भरी भी हो सकीं दिलों कि सरज़मीं कहीं
पड़ी तेरी निगाह भी, कभी कभी, कहीं कहीं
पड़ी तेरी निगाह भी, कभी कभी, कहीं कहीं
Monday, May 25, 2009
firaq gorkhpuri ki shayyiri
किसी का यूं तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी
ये हुस्न-ओ-इश्क़ तो धोका है सब, मगर फिर भी
हजार बार ज़माना इधर से गुजरा
नई नई है मगर कुछ तेरी रहगुज़र फिर भी
खुशा इशारा-ए-पैहम, जेह-ए-सुकूत नज़र
दराज़ होके फ़साना है मुख्तसर फिर भी
झपक रही हैं ज़मान-ओ-मकाँ की भी आँखें
मगर है काफ्ला आमादा-ए-सफर फिर भी
पलट रहे हैं गरीबुल वतन, पलटना था
वोः कूचा रूकश-ए-जन्नत हो, घर है घर, फिर भी
तेरी निगाह से बचने मैं उम्र गुजरी है
उतर गया रग-ए-जान मैं ये नश्तर फिर भी
ये हुस्न-ओ-इश्क़ तो धोका है सब, मगर फिर भी
हजार बार ज़माना इधर से गुजरा
नई नई है मगर कुछ तेरी रहगुज़र फिर भी
खुशा इशारा-ए-पैहम, जेह-ए-सुकूत नज़र
दराज़ होके फ़साना है मुख्तसर फिर भी
झपक रही हैं ज़मान-ओ-मकाँ की भी आँखें
मगर है काफ्ला आमादा-ए-सफर फिर भी
पलट रहे हैं गरीबुल वतन, पलटना था
वोः कूचा रूकश-ए-जन्नत हो, घर है घर, फिर भी
तेरी निगाह से बचने मैं उम्र गुजरी है
उतर गया रग-ए-जान मैं ये नश्तर फिर भी
Sunday, May 10, 2009
firaq ki shayyiri
काफी दिनोँ जिया हूँ किसी दोस्त के बगैर
अब तुम भी साथ छोड़ने को
कह रहे हो खैर !!
कब से तेरे दयार में हूँ मैं तेरे बगैर
मुझसे है आसमान को
खुदा वास्ते का बैर !!
यूँ जिन्दगी गूज़ार रहा हूँ तेरे बगैर
जैसे करे खज़ां में कोई
गुलिस्ताँ की सैर !!
बाँधो सफ़ें नमाजे-जमाअत के वास्ते
मैं कौन ऐ सयुखें-हरम(काबे का अध्यक्ष)
पेशइमामे दैर(बूतखाने का पुरोधा)
जाते हैं दाग़ सोहबते-शब का लिए हुए
अच्चा जो हो सका तो कल
आयेंगे शब-बखैर
उकबा की जिंदगी का खुदा हाफिज़ ऐ नदीम
हम तो मन रहे हैं इसी
जिंदगी की खैर
ता-हाल हो सके न हम आहंग(सम्मिलित आवाज़) साजे-दहर
कानों में आ रहीं हैं अभी
एक सदा-ए-गैर
अख़लाके-तब-एं-यार तुझे मानना पड़ा
मिलना उसी तपाक से वो
खवैश हों की गैर
जो भी निगाह उठती है मैकदा-बदोश
ऐ नर्गिशे-सियाह
तेरी नीयतें बखैर
तकदीरे-हुस्नो-इश्क जुदाई है अलविदा
है जिन्दगी अगर तो कभी
फिर मिलेंगे खैर
राहें पुकारती हैं की साहेब परे-परे
शोले बीछे हुए हैं, दिलो के बचा के पैर
इस कुर्ब से तो दर्दे-"फिराक" और बढ़ गया
'घर जब बना लिया तेरे दर पर कहे बगैर'
अब तुम भी साथ छोड़ने को
कह रहे हो खैर !!
कब से तेरे दयार में हूँ मैं तेरे बगैर
मुझसे है आसमान को
खुदा वास्ते का बैर !!
यूँ जिन्दगी गूज़ार रहा हूँ तेरे बगैर
जैसे करे खज़ां में कोई
गुलिस्ताँ की सैर !!
बाँधो सफ़ें नमाजे-जमाअत के वास्ते
मैं कौन ऐ सयुखें-हरम(काबे का अध्यक्ष)
पेशइमामे दैर(बूतखाने का पुरोधा)
जाते हैं दाग़ सोहबते-शब का लिए हुए
अच्चा जो हो सका तो कल
आयेंगे शब-बखैर
उकबा की जिंदगी का खुदा हाफिज़ ऐ नदीम
हम तो मन रहे हैं इसी
जिंदगी की खैर
ता-हाल हो सके न हम आहंग(सम्मिलित आवाज़) साजे-दहर
कानों में आ रहीं हैं अभी
एक सदा-ए-गैर
अख़लाके-तब-एं-यार तुझे मानना पड़ा
मिलना उसी तपाक से वो
खवैश हों की गैर
जो भी निगाह उठती है मैकदा-बदोश
ऐ नर्गिशे-सियाह
तेरी नीयतें बखैर
तकदीरे-हुस्नो-इश्क जुदाई है अलविदा
है जिन्दगी अगर तो कभी
फिर मिलेंगे खैर
राहें पुकारती हैं की साहेब परे-परे
शोले बीछे हुए हैं, दिलो के बचा के पैर
इस कुर्ब से तो दर्दे-"फिराक" और बढ़ गया
'घर जब बना लिया तेरे दर पर कहे बगैर'
Friday, April 17, 2009
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