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Friday, May 29, 2009

gulzar ki shayyiri

ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा
काफिला साथ और सफर तन्हा
अपने साए से चौंक जाते हैं
उमर गुजरी है इस कदर तन्हा
रात भर बोलते हैं सनाटे
रात काटे कोई किधर तन्हा
दिन गुज़रता नही है लोगो में
रात होती नही बसर तन्हा
हमने दरवाज़े तक तोह देखा था
फिर न जाने गए किधर तन्हा

gulzar ki shayyiri

दिन कुछ ऐसे गुज़रता है कोई
जैसे एहसान उतरता है कोई
आईना देख के तसली हुई
हमको इस घर में जानता है कोई
पक गया है शजर पे फल शायद
फिर से पत्थर उछलता है कोई
फिर नज़र में लहू के छींटे हैं
तुमको शाद मुगाताहाई कोई
देर से गूंजते हैं सन्नाटे
जैसे हमको पुकारता है कोई

gulzar ki shayyiri

शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आपकी कमी सी है
दफ़न कर दो हमें की साँस मिले
नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है
वक्त रहता नही कहीं छुपकर
इसकी आदत भी आदमी सी है
कोई रिश्ता नही रहा फिर भी
एक तस्लीम लाज़मी सी है

wel come