ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा
काफिला साथ और सफर तन्हा
अपने साए से चौंक जाते हैं
उमर गुजरी है इस कदर तन्हा
रात भर बोलते हैं सनाटे
रात काटे कोई किधर तन्हा
दिन गुज़रता नही है लोगो में
रात होती नही बसर तन्हा
हमने दरवाज़े तक तोह देखा था
फिर न जाने गए किधर तन्हा
nikala mujhko zannat se fareb-e-zindgi de kar.............. diya phir shaunq zannat ka ye hairani nahi jaati.......
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Friday, May 29, 2009
gulzar ki shayyiri
दिन कुछ ऐसे गुज़रता है कोई
जैसे एहसान उतरता है कोई
आईना देख के तसली हुई
हमको इस घर में जानता है कोई
पक गया है शजर पे फल शायद
फिर से पत्थर उछलता है कोई
फिर नज़र में लहू के छींटे हैं
तुमको शाद मुगाताहाई कोई
देर से गूंजते हैं सन्नाटे
जैसे हमको पुकारता है कोई
जैसे एहसान उतरता है कोई
आईना देख के तसली हुई
हमको इस घर में जानता है कोई
पक गया है शजर पे फल शायद
फिर से पत्थर उछलता है कोई
फिर नज़र में लहू के छींटे हैं
तुमको शाद मुगाताहाई कोई
देर से गूंजते हैं सन्नाटे
जैसे हमको पुकारता है कोई
gulzar ki shayyiri
शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आपकी कमी सी है
दफ़न कर दो हमें की साँस मिले
नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है
वक्त रहता नही कहीं छुपकर
इसकी आदत भी आदमी सी है
कोई रिश्ता नही रहा फिर भी
एक तस्लीम लाज़मी सी है
आज फिर आपकी कमी सी है
दफ़न कर दो हमें की साँस मिले
नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है
वक्त रहता नही कहीं छुपकर
इसकी आदत भी आदमी सी है
कोई रिश्ता नही रहा फिर भी
एक तस्लीम लाज़मी सी है
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