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Friday, May 29, 2009

rashid kamil ki shayyiri

कभी आह लब पे मचल गई, कभी अश्क अंख से ढल गए
वो तुम्हारे ग़म के चिराग हैं, कभी बुझ गए कभी जल गए
मैं ख्याल--ख्वाब की महफिले बाक़द्र--शौक़ सजा सका
तुम्हारी इक नज़र के साथ ही मेरे सब इरादे बदल गए
कभी रंग में कभी रूप में, कभी छाव में कभी धुप में
कहीं अफताब--नज़र हैं वो, कहीं महताब में ढल गए
जो फना हुए ग़म--इश्क में, उन्हे ज़िन्दगी का गम हुआ
जो अपनी आग में जल सके वो पराई आग में जल गए
या उन्हे भी मेरी तरह जूनून तोह फिर उन् में मुझ में ये फर्क क्या
मैं गिरफ्त--ग़म से बच सका, वो हुदूद--गम से निकल गए

rashid kamil ki shayyiri

दर्द का हद से गुज़रना तोह अभी बाकी है
टूट कर मेरा बिखरना तोह अभी बाकी है
पास आके मेरा दुःख-दर्द बाटनेवाले
मुझसे कतरा के गुज़रना तोह अभी बाकी है
चाँद शेरों में कहाँ ढलती है एहसास की आग
ग़म का ये रंग निखारना तोह अभी बाकी है
रंग-ऐ-रुसवाई सही, शहर की दीवारों पर
नाम 'राशिद' का उभारना तोह अभी बाकी है

wel come