कभी आह लब पे मचल गई, कभी अश्क अंख से ढल गए
वो तुम्हारे ग़म के चिराग हैं, कभी बुझ गए कभी जल गए
मैं ख्याल-ओ-ख्वाब की महफिले न बाक़द्र-ऐ-शौक़ सजा सका
तुम्हारी इक नज़र के साथ ही मेरे सब इरादे बदल गए
कभी रंग में कभी रूप में, कभी छाव में कभी धुप में
कहीं अफताब-ऐ-नज़र हैं वो, कहीं महताब में ढल गए
जो फना हुए ग़म-ऐ-इश्क में, उन्हे ज़िन्दगी का न गम हुआ
जो न अपनी आग में जल सके वो पराई आग में जल गए
या उन्हे भी मेरी तरह जूनून तोह फिर उन् में मुझ में ये फर्क क्या
मैं गिरफ्त-ऐ-ग़म से न बच सका, वो हुदूद-ऐ-गम से निकल गए
nikala mujhko zannat se fareb-e-zindgi de kar.............. diya phir shaunq zannat ka ye hairani nahi jaati.......
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Friday, May 29, 2009
rashid kamil ki shayyiri
दर्द का हद से गुज़रना तोह अभी बाकी है
टूट कर मेरा बिखरना तोह अभी बाकी है
पास आके मेरा दुःख-दर्द बाटनेवाले
मुझसे कतरा के गुज़रना तोह अभी बाकी है
चाँद शेरों में कहाँ ढलती है एहसास की आग
ग़म का ये रंग निखारना तोह अभी बाकी है
रंग-ऐ-रुसवाई सही, शहर की दीवारों पर
नाम 'राशिद' का उभारना तोह अभी बाकी है
टूट कर मेरा बिखरना तोह अभी बाकी है
पास आके मेरा दुःख-दर्द बाटनेवाले
मुझसे कतरा के गुज़रना तोह अभी बाकी है
चाँद शेरों में कहाँ ढलती है एहसास की आग
ग़म का ये रंग निखारना तोह अभी बाकी है
रंग-ऐ-रुसवाई सही, शहर की दीवारों पर
नाम 'राशिद' का उभारना तोह अभी बाकी है
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