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Friday, May 22, 2009

ibrahim ashk ki shayyiri

तेरे शहर मैं एक दीवाना भी है
जो सब के सितम का निशाना भी है
बड़ा सिलसिला है खुदा से मेरा
फलक पे मेरा आना जाना भी है
है मकसद तो अपनी ही तक्मील का
मोहब्बत यह तेरी बहाना भी है
रवायत है आदम से यह इश्क़ की
यह सौदा बोहत ही पुराना भी है
भटकते हैं आवारा गलियों मैं हम
कहीं आशिकों का ठिकाना भी है
मुसलसल सफर मैं ही अपनी हयात
यहाँ से कहीं लौट जाना भी है
मिले वोः तो कुछ हाल-ए-दिल हम कहें
आज मौसम सुहाना भी है
कही है ग़ज़ल हमने उसके लिए
यह अश्क जिस से छुपाना भी है


ibrahim ashk ki shayyiri

बे-सबब दामन भिगोना आ गया
बात करते करते रोना आ गया
खेलता रहता है मेरी दिल से वो
हाथ में उसके खिलौना आ गया
बैठे बैठे उठ के चल देते हैं हम
इश्क़ में बेताब होना आ गया
दर-ब-दर होने का यह इनाम है
हर किसी के दर पे सोना आ गया
उसको पाना था मगर पाया नहीं
ये हुआ कि खुद को खोना आ गया
आंसुओं में ढल गया दिल का लहू
इस लहू से मुँह धोना भी आ गया
जब छुआ उसका बदन तो यूं लगा
हाथ में मिट्टी के सोना आ गया
चांद सा चेहरा, सितारे बाल में
रात को मोती पिरोना आ गया
लहलहा उठी हैं फसलें शेर की
अश्क तुम को बीज बोना आ गया


wel come