तेरे शहर मैं एक दीवाना भी है
जो सब के सितम का निशाना भी है
बड़ा सिलसिला है खुदा से मेरा
फलक पे मेरा आना जाना भी है
है मकसद तो अपनी ही तक्मील का
मोहब्बत यह तेरी बहाना भी है
रवायत है आदम से यह इश्क़ की
यह सौदा बोहत ही पुराना भी है
भटकते हैं आवारा गलियों मैं हम
कहीं आशिकों का ठिकाना भी है
मुसलसल सफर मैं ही अपनी हयात
यहाँ से कहीं लौट जाना भी है
मिले वोः तो कुछ हाल-ए-दिल हम कहें
आज मौसम सुहाना भी है
कही है ग़ज़ल हमने उसके लिए
यह अश्क जिस से छुपाना भी है
nikala mujhko zannat se fareb-e-zindgi de kar.............. diya phir shaunq zannat ka ye hairani nahi jaati.......
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Friday, May 22, 2009
ibrahim ashk ki shayyiri
बे-सबब दामन भिगोना आ गया
बात करते करते रोना आ गया
खेलता रहता है मेरी दिल से वो
हाथ में उसके खिलौना आ गया
बैठे बैठे उठ के चल देते हैं हम
इश्क़ में बेताब होना आ गया
दर-ब-दर होने का यह इनाम है
हर किसी के दर पे सोना आ गया
उसको पाना था मगर पाया नहीं
ये हुआ कि खुद को खोना आ गया
आंसुओं में ढल गया दिल का लहू
इस लहू से मुँह धोना भी आ गया
जब छुआ उसका बदन तो यूं लगा
हाथ में मिट्टी के सोना आ गया
चांद सा चेहरा, सितारे बाल में
रात को मोती पिरोना आ गया
लहलहा उठी हैं फसलें शेर की
अश्क तुम को बीज बोना आ गया
बात करते करते रोना आ गया
खेलता रहता है मेरी दिल से वो
हाथ में उसके खिलौना आ गया
बैठे बैठे उठ के चल देते हैं हम
इश्क़ में बेताब होना आ गया
दर-ब-दर होने का यह इनाम है
हर किसी के दर पे सोना आ गया
उसको पाना था मगर पाया नहीं
ये हुआ कि खुद को खोना आ गया
आंसुओं में ढल गया दिल का लहू
इस लहू से मुँह धोना भी आ गया
जब छुआ उसका बदन तो यूं लगा
हाथ में मिट्टी के सोना आ गया
चांद सा चेहरा, सितारे बाल में
रात को मोती पिरोना आ गया
लहलहा उठी हैं फसलें शेर की
अश्क तुम को बीज बोना आ गया
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