ये सन्नाटा बोहत महँगा पडेगा
उसे भी फूट कर रोना पडेगा
वही दो चार चेहरे अजनबी से
उन्हीं को फिर से दोहराना पडेगा
कोई घर से निकलता ही नहीं है
हवा को थक के सो जाना पडेगा
यहाँ सूरज भी काला पड़ गया है
कहीं से दिन भी मंगवाना पडेगा
वोः अच्छे थे जो पहले मर गए हैं
हमें कुछ और पछताना पडेगा
फज़ल ताबिश
nikala mujhko zannat se fareb-e-zindgi de kar.............. diya phir shaunq zannat ka ye hairani nahi jaati.......
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Friday, May 22, 2009
fazal taabish ki shayyiri
तमन्ना का सर यूं उतारा गया
हर एक बीच रस्ते में मारा गया
मैं किस किस की आवाज़ पर दौड़ता
मुझे चौ-तरफ से पुकारा गया
वहां ज़ख्म पर बात ही कब हुई
फ़क़त आंसुओं को शुमारा गया
हवस थी उसे मेरी हर चीज़ की
मगर मुझसे सब कुछ न हारा गया
हर एक बीच रस्ते में मारा गया
मैं किस किस की आवाज़ पर दौड़ता
मुझे चौ-तरफ से पुकारा गया
वहां ज़ख्म पर बात ही कब हुई
फ़क़त आंसुओं को शुमारा गया
हवस थी उसे मेरी हर चीज़ की
मगर मुझसे सब कुछ न हारा गया
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