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Sunday, June 7, 2009

mohsin ki shayyiri

यह दिल यह पागल दिल मेरा क्यों बुझ गया आवारगी
इस दस्त में एक शेहर था वो क्या हुआ आवारगी
कल शब् मुझे बे-शक्ल सी आवाज़ ने चौंका दिया
मैंने कहा तू कौन है उस ने कहा आवारगी
लोग उस शहर में भला कैसे जियेंगे हम जहाँ
हो जुर्म तन्हा सोचना, लेकिन सज़ा आवारगी
एक तू के सदियों से मेरे हम राह भी हम राज़ भी
एक मैं के तेरे नाम से नाआशना आवारगी
यह दर्द की तनहइयां यह दस्त का वीरान सफर
हम लोग तो उकता गए अपनी सुना आवारगी
एक अजनबी झोंके ने जब पूछा मेरे ग़म का सबब
सहारा की भीगी रेत पर मैंने लिखा आवारगी
ले अब तो दस्त-ए-शब् की सारी वसूअतें शौंक लगे
अब जागना होगा हमें कब तक बता आवारगी
कल रात तन्हा चाँद को देखा था मैंने खाब में
`मोहसिन' मुझे रास आएगी शायद सदा आवारगी

Thursday, June 4, 2009

mohsin ki shayyiri

ऑंखें खुली रहेंगी तो मंज़र भी आयेंगे
जिंदा है दिल तो और सितमगर भी आयेंगे
पहचान लो तमाम फकीरों के खद-ओ-खाल
कुछ लोग शब् को भेष बदल कर भी आयेंगे
गहरी खामोश झील के पानी को यूँ ना छेड़
छींटे उड़े तो तेरी क़बा पर भी आयेंगे
खुदको छुपा न शीशागारों की दूकान में
शीशे चमक रहे हैं तो पत्थर भी आयेंगे
ऐ शहर यार दस्त से फुर्सत नही — मगर !!
निकल सफर पे हम तो तेरे घर भी आयेंगे
'मोहसिन' अभी सबा की सखावत पे खुश न हो
झोंके येही बसूरत-ए-सर सर भी आयेंगे

mohsin ki shayyiri

बदला ना तेरे बाद भी मोज़ो-ए-गुफ्तगू
तू जा चुका है फिर भी मेरी महफिलों में है

mohsin ki shayyiri

मैंने इस तौर से चाहा तुझे अक्सर जानाँ
जैसे महताब को बे-अंत समंदर चाहे
जैसे सूरज की किरण सीप के दिल में उतरे
जैसे खुशबू को हवा रंग से हट कर चाहे

mohsin ki shayyiri

कतल छुपते थे कभी संग की दीवार के बीच
अब तो खुलने लगे मकतल भरे बाज़ार के बीच
अपनी पोशाक के छीन जाने पे अफ़सोस कर
सर सलामत नही रहते यहाँ दस्तर के बीच
सुर्खियाँ अमन की तलकीन में मसरूफ रहें
हरूफ बारूद उगलते रहे अख़बार के बीच
काश इस खुवाब की ताबीर की मोहलत न मिले
शोले उगते नज़र आए मुझे गुलज़ार के बीच
ढलते सूरज की तमाज़त ने बिखर कर देखा
सर कशीदा मेरा साया साफ-ए-अश्जार के बीच
रिजक, मलबोस, मकाँ, साँस, मर्ज़, क़र्ज़, दवा
मुन्किसम हो गया इंसान इन्ही अफ़कार के बीच
देखे जाते न थे आंसू मेरे जिस से 'मोहसिन'
आज हँसते हुए देखा उससे अग्यार के बीच

mohsin ki shayyiri

कभी तू मओहीत-ए-हवास था, सो नही रहा
मैं तेरे बगैर उदास था, सो नही रहा
मेरी वुसतों की हवास का खाना ख़राब हो
मेरा गाँव सहर के पास था, सो नही रहा
तेरी दस्तरस में थीं बख्शिशें, सो नही रहीं
मेरे लब पे हर्फ़-ए-सपास था, सो नही रहा
मेरा अक्स मुझसे उलझ पड़ा तो गिरां खुली
कभी मैं बे_चेहरा शनास था, सो नही रहा
मेरे बाद नोहा बा_लब हवाएं कहा करें
वोह जो इक दरीदा लिबास था, सो नही रहा
मैं शिकस्ता दिल हूँ साफ-ए-अददो की शिकस्त पर
वोह जो लत्फ़-ए-खौफ-ओ-हिरास था, सो नही रहा

Tuesday, June 2, 2009

mohsin ki shayyiri

कभी जो एहद-ए-वफ़ा मेरी जान तेरे मेरे दरमियाँ टूटे
मैं चाहता हूँ के इससे पहले ज़मीन पे ये आसमान टूटे
तेरी जुदाई में होंसलों की शिकस्त दिल पर आजाब ठहरी
के जैसे मौन-जूर ज़लज़लों की धमक से कोई चटान टूटे
उससे यकीन था, उसको मरना है, फिर भी ख्वाइश थी उसके दिल में
कि तीर चलने से पेश्तर दस्त-ए-दुश्मन में कमान टूटे
वो संग है तो गिरे भी दिल पर, वो आईना है तो चुभ ही जाए
कहीं तो मेरा यकीन बिखरे, कहीं तो मेरा गुमान टूटे
उजाड़ बन की उदास रूत में ग़ज़ल तो 'मोहसिन' ने छेड़ दी है
किसे ख़बर है कि किस के मासूम दिल पर अब के ये तान टूटे

Monday, June 1, 2009

mohsin ki shayyiri

दर-ए-क़फ़स से परे जब सबा गुज़रती है
किसे ख़बर अस्वरों पे क्या गुज़रती है
तालूकात कभी इस कदर टूटे थे
के तेरी याद भी दिल से ख़फा गुज़रती है
वो अब मिले भी तो मिलता है इस तरह जैसे
बुझे चिरागों को छू कर हवा गुज़रती है
ये अहल-ए-हिजर की बस्ती है इख्तियात से चल
मुसीबतों की यहाँ इंतेहा की गुज़रती है
भंवर से बच तो गयीं कश्तियाँ मगर अब के
दिलों की खैर के मौज-ए-बला गुज़रती है
पूछ अपनी अना की बगावतें 'मोहसिन'
दर--कबूल से बच के दुआ गुज़रती है

Sunday, May 31, 2009

mohsin ki shayyiri

मेरे हाथों की लकीरों में ये एब छुपा है 'मोहसिन' !!!!!!
जिस शख्स को छू लूँ वो मेरा नही रहता

mohsin ki shayyiri

मेरे हाथों की लाकेर्रों में ये एब छुपा है 'मोहसिन' !!!!!!
जिस शख्स को छू लूँ वो मेरा नही रहता

Saturday, May 30, 2009

mohsin ki shayyiri

अब ऐ मेरे एहसास-ऐ-जूनून किया मुझे देना ?
दरिया उससे बख्शा है तोह सेहरा मुझे देना
तुम अपना मकान जब करो तकसीम तोह यारों !
गिरती हुई दीवार का साया मुझे देना
जब वक्त की मुरझाई हुई शाख संभालो
उस शाख से टूटा हुआ लम्हा मुझे देना
तुम मेरा बदन ओढ़ के फिरते रहो - लेकिन
मुमकिन हो तो एक दिन मेरा चेहरा मुझे देना
छू जाए हवा जिस्म से तो खुशबू तेरी आए
जाते हुए एक ज़ख्म तो ऐसा मुझे देना
एक दर्द का मेला है लगा है दिल-ओ-जान में
एक रुह की आवाज़ के रास्ता मुझे देना
एक ताज़ा ग़ज़ल अज्न-ऐ-सुखन मांग रही है
तुम अपना महकता हुआ लहजा मुझे देना
वो मुझसे कहीं बढ़ के मुसीबत में था 'मोहसिन'
रह रह के मगर उस का दिलासा मुझे देना

mohsin ki shayyiri

रेत पर लिख के मेरा नाम मिटाया न करो
आँखें सच बोलती हैं प्यार छुपाया न करो
लोग हर बात का अफसाना बना लेते हैं
सब को हालत की रुदाद[story] सुनाया न करो
ये ज़रूरी नहीं हर शख्स मसीहा ही हो
प्यार के ज़ख्म अमानत हैं दिखाया न करो
शहर-ए-एहसास में पथराव बहुत हैं 'मोहसिन'
दिल को शीशे के झरोंखों में सजाया न करो

Friday, May 29, 2009

mohsin ki shayyiri

दिया ख़ुद से बुझा देना, हवा को और क्या देना ?
सितारे नोचने वालो, फलक को आसरा देना
कभी इस तौर से हसना, के दुनिया को रुला देना
कभी इस रंग से रोना, के ख़ुद पे मुसकुरा देना
मैं तेरी दस्तरस चहुँ, मुझे ऐसी दुआ देना
मैं तेरा बरमला मुजरिम, मुझे खुल कर सज़ा देना
मैं तेरा 'मुनफरीद साथी', मुझे हा'अत कर ज'जा देना
मेरा सर सब से ऊंचा है, मुझे मकतल नया देना
मुझे अच्छा लगा 'मोहसिन', उससे पा कर गँवा देना

Monday, November 24, 2008

mohsin ki shayyiri

मंसूब थे जो लोग मेरी जिनदगी के साथ
अक्सर वही मिले बड़ी बेरुखी के साथ
यूँ तो मैं हंस पड़ा हूँ तुम्हारे लिए मगर
कितने सितारे टूट पड़े हैं इस इक हँसी के साथ
फुर्सत मिले तो अपना गिरेबाँ भी देख ले
! दोस्त यूँ खेल मेरी बेबसी के साथ
मजबूरीयों की बात चली है तो मय कहाँ
हमने पिया है जहर भी अक्सर ख़ुशी के साथ
चेहरे बदल बदल कर मुझे मिल रहे हैं लोग
इतना बुरा सलूक मेरी सादगी के साथ
इक सजदा--खूलुस की कीमत फिजा--खिलद
या रब ! मजाक़ ना कर मेरी बंदगी के साथ
"मोहसिन" करम की लय भी हो जिस में खलूस भी
मुझको गज़ब का प्यार है उस दुश्मनी के साथ....!!!!

wel come