Sunday, June 7, 2009

mohsin ki shayyiri

यह दिल यह पागल दिल मेरा क्यों बुझ गया आवारगी
इस दस्त में एक शेहर था वो क्या हुआ आवारगी
कल शब् मुझे बे-शक्ल सी आवाज़ ने चौंका दिया
मैंने कहा तू कौन है उस ने कहा आवारगी
लोग उस शहर में भला कैसे जियेंगे हम जहाँ
हो जुर्म तन्हा सोचना, लेकिन सज़ा आवारगी
एक तू के सदियों से मेरे हम राह भी हम राज़ भी
एक मैं के तेरे नाम से नाआशना आवारगी
यह दर्द की तनहइयां यह दस्त का वीरान सफर
हम लोग तो उकता गए अपनी सुना आवारगी
एक अजनबी झोंके ने जब पूछा मेरे ग़म का सबब
सहारा की भीगी रेत पर मैंने लिखा आवारगी
ले अब तो दस्त-ए-शब् की सारी वसूअतें शौंक लगे
अब जागना होगा हमें कब तक बता आवारगी
कल रात तन्हा चाँद को देखा था मैंने खाब में
`मोहसिन' मुझे रास आएगी शायद सदा आवारगी

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