तेरे प्यार में रुसवा हो कर जाएँ कहाँ दीवाने लोग
जाने क्या क्या पूछ रहे हैं यह जाने पहचाने लोग
हर लम्हा एहसास की सबा रूह में ढलती जाती है
ज़ीस्त का नशा कुछ कम हो तो हो आयें महखाने लोग
जैसे तुम्हें हमने चाहा है कौन भला यूँ चाहेगा
माना और बोहत आयेंगे तुमसे प्यार जताने लोग
यूँ गलियों बाज़ारों में आवारा फिरते रहते हैं
जैसे इस दुनिया में सभी आए हो उमर गंवाने लोग
आगे पीछे दायें बाएँ साए से लहराते हैं
दुनिया भी तो दस्त-ए-बला है हम ही नहीं दीवाने लोग
कैसे दुखों के मौषम आए कैसी आग लगी यारो
अब सहराओं से लाते हैं फूलों के नजराने लोग
कल मातम बे-कीमत होगा, आज इनकी तौकीर करो
देखो खून-ए-जिगर से क्या क्या लिखते हैं अफ़साने लोग
nikala mujhko zannat se fareb-e-zindgi de kar.............. diya phir shaunq zannat ka ye hairani nahi jaati.......
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Friday, June 5, 2009
Thursday, April 30, 2009
ubaidullah alim ki shayyiri
कुछ दिन तो बसो मेरी आँखों में
फिर ख्वाब अगर हो जाओ तो क्या
कोई रंग तो दो मेरे चेहरे को
फिर ज़ख्म अगर महकाओ तो क्या
जब हम ही न महके फिर साहब
तुम बाद-ए-सबा कहलाओ तो क्या
एक आईना था, सो टूट गया
अब खुद से अगर शरमाओ तो क्या
दुनिया भी वही और तुम भी वही
फिर तुमसे आस लगाओ तो क्या
मैं तनहा था, मैं तनहा हूँ
तुम आओ तो क्या, न आओ तो क्या
जब देखने वाला कोई नहीं
बुझ जाओ तो क्या, गहनाओ तो क्या
एक वहम है ये दुनिया इसमें
कुछ खो'ओ तो क्या और पा'ओ तो क्या
है यूं भी ज़ियाँ और यूं भी ज़ियाँ
जी जाओ तो क्या मर जाओ तो क्या
फिर ख्वाब अगर हो जाओ तो क्या
कोई रंग तो दो मेरे चेहरे को
फिर ज़ख्म अगर महकाओ तो क्या
जब हम ही न महके फिर साहब
तुम बाद-ए-सबा कहलाओ तो क्या
एक आईना था, सो टूट गया
अब खुद से अगर शरमाओ तो क्या
दुनिया भी वही और तुम भी वही
फिर तुमसे आस लगाओ तो क्या
मैं तनहा था, मैं तनहा हूँ
तुम आओ तो क्या, न आओ तो क्या
जब देखने वाला कोई नहीं
बुझ जाओ तो क्या, गहनाओ तो क्या
एक वहम है ये दुनिया इसमें
कुछ खो'ओ तो क्या और पा'ओ तो क्या
है यूं भी ज़ियाँ और यूं भी ज़ियाँ
जी जाओ तो क्या मर जाओ तो क्या
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