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Friday, May 29, 2009

simaab ki shayyiri

सरगश्ता[परेशान]--ज़माल की हैरानियाँ ना पूछ
हर ज़र्रे के हिजाब में इक आईना मिला

Friday, May 22, 2009

simaab ki shayyiri

दिल की बिसात क्या थी निगाह-ए-जमाल में
एक आईना था टूट गया देखभाल में
सब्र आ ही जाए गर हो बसर एक हाल में
इमकां एक और ज़ुल्म है क़ैद-ए-मुहाल में
आज़ुरदा इस क़दर हूं सराब-ए-ख़याल से
जी चाहता है तुम भी न आओ ख़याल में
तंग आ के तोड़ता हूं तिलिस्म-ए-ख़याल को
या मुतमईन करो कि तुम्हीं हो ख़याल में
दुनिया है ख़्वाब हासिल-ए-दुनिया ख़याल है
इंसान ख़्वाब देख रहा है ख़याल में
उम्रर-ए-दो-रोज़ा वाक़ई ख़्वाब-ख़याल थी
कुछ ख़्वाब में गुज़र गई बाक़ी ख़याल में
सीमाब अकबराबादी

Thursday, May 21, 2009

simaab ki shayyiri

ये एक ही तो नेमते-इंसां-नवाज़ थी
दिल मुझको मिल गया तो खुदाई को कया मिला

Saturday, May 2, 2009

simaab ki shayyiri

वो खुद अता करे तो ज़ह्ननूम भी है बिहिश्त[सवर्ग]
मांगी हुयी निजात मेरे काम की नही

Tuesday, April 28, 2009

simaab ki shayyiri

निकाला मुझको महफिल से मगर इतना ना समझे तुम
कि इक हस्रतज़दा क्यूँकर भरी महफिल से निकलेगा

wel come