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Thursday, April 16, 2009

fitni ki shayyiri

मेहरो-वफ़ा में दिखावट बहुत है
खाव मजबूत है बुनावट बहुत है
रोज़-ए-ज़ज़ा आना है एक दिन
जहाँ में फिर भी सजावट बहुत है
बाज़ न आ रहा है सितम-जरीफ
उसे मालूम मुझे थकावट बहुत है

fitni ki shayyiri

जज्बा-ए-दिल की तासीर से परेशान हूँ
दामन-ए-ख्याल-ए-यार से हैरान हूँ
करूँ शिकवा कैसे अपनी खस्तगी का अब
बीमार-ए-इश्क हूँ, कुछ दिन का मेहमान हूँ
आनी है, आएगी इक दिन तो तुझे कजा
न समझ की यहाँ पर में रहमान हूँ
पूरा न होने दिया अहले-दुनियाँ ने जो
दिल से निकला किसी का अरमान हूँ

fitni ki shayyiri

दर्द के साँचे से गड़ा है, मगर चुप पड़ा रहता है
अगर न हो बरसात, तो खेतों में खडा रहता है
उछल रहा है, देखो तो जरा कौमों के नाम पर
फल नाम से अच्छा हो जो सड़ा है वो सड़ा रहता है
हम वो दरवेश है जिसे मज़हब बाँध न पायेगा
मेरी माला मैं गुहर की तरह,हर मज़हब पड़ा रहता है
भूल कैसे गया उससे ही तो तेरा वजूद कायम है
बाप-बाप है, हमेशा बेटे से बड़ा ही रहता है .....
न सोच 'फितनी' वो तेरा भला नहीं चाहता
जो चाहता है भला, उसका मिजाज कडा रहता है ...

wel come