तुझे क्या सुनाऊं ऐ दिलरुबा
तेरे सामने मेरा हाल है
तेरी इक निगाह की बात है
मेरी जिंदगी का सवाल है
मेरी हर खुशी तेरे दम से है
मेरी जिदंगी तेरे ग़म से है
तेरे दर्द से रहे बेखबर
मेरे दिल की कब ये मजाल है
तेरे हुस्न पर है मेरी नज़र
मुझे सुबह शाम की क्या ख़बर
मेरी शाम है तेरी जुस्तजू
मेरी सुबह तेरा ख्याल है
मेरे दिल जिगर में समां भी जा
रहे क्यूँ नज़र का भी फासला
के तेरे बगैर ओ जाने-ए-जाँ
मुझे जिंदगी भी मुहाल है
nikala mujhko zannat se fareb-e-zindgi de kar.............. diya phir shaunq zannat ka ye hairani nahi jaati.......
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Friday, June 5, 2009
Monday, June 1, 2009
majrooh sultanpuri ki shayyiri
रोक सकता हमें जिदां[prison]-ऐ-बला[problem] क्या 'मजरूह'
हम तो आवाज़ हैं दीवारों से छन जाते हैं
हम तो आवाज़ हैं दीवारों से छन जाते हैं
Thursday, April 30, 2009
majrooh sultanpuri ki shayyiri
मुझे सहल हो गई मंज़िलें, वह हवा के रुख़ भी बदल गए
तेरा हाथ हाथ में आ गया कि चिराग़ राह में जल गए
वह लजाए मेरे सवाल पे कि उठा सके न झुका के सर
उड़ी ज़ुल्फ़ चेहरे पे इस तरह कि शबों के राज़ मचल गए
वही बात जो न वो कह सके, मेरे शे'अर-ओ-नग़्मा में आ गई
वही लब न मैं जिन्हें छू सका क़दह-ए-शराब में ढल गए
वही आस्तां है वही अश्क है वही आस्तीं
दिल-ए-ज़ार तू भी तो बदल कि जहां के तौर बदल गए
तुझे चश्म-ए-मस्त पता भी है कि शबाब गर्मी-ए-बज़्म है
तुझे चश्म-ए-मस्त ख़बर भी है कि सब आबगीने पिघल गए
मेरे काम आ गईं आख़िरश यही काविशें, यही गर्दिशें
बढी इस क़दर मेरी मज़िलें कि क़दम के ख़ार निकल गए
तेरा हाथ हाथ में आ गया कि चिराग़ राह में जल गए
वह लजाए मेरे सवाल पे कि उठा सके न झुका के सर
उड़ी ज़ुल्फ़ चेहरे पे इस तरह कि शबों के राज़ मचल गए
वही बात जो न वो कह सके, मेरे शे'अर-ओ-नग़्मा में आ गई
वही लब न मैं जिन्हें छू सका क़दह-ए-शराब में ढल गए
वही आस्तां है वही अश्क है वही आस्तीं
दिल-ए-ज़ार तू भी तो बदल कि जहां के तौर बदल गए
तुझे चश्म-ए-मस्त पता भी है कि शबाब गर्मी-ए-बज़्म है
तुझे चश्म-ए-मस्त ख़बर भी है कि सब आबगीने पिघल गए
मेरे काम आ गईं आख़िरश यही काविशें, यही गर्दिशें
बढी इस क़दर मेरी मज़िलें कि क़दम के ख़ार निकल गए
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