कमर बांधे हुए चलने पे याँ सब यार बैठे हैं
बोहत आगे गये, बाक़ी जो हैं तैयार बैठे हैं
न छेड़, ऐ निक'हत-ए-बाद-ए-बाहरी ! राह लग अपनी
तुझे अठखेलियाँ सूझी हैं, हम बे-जार बैठे हैं
अखायल उंनका पड़े है 'अर्श-ऐ-आज़म से कहीं साकी !
ग़रज़ कुछ धुन में इस घड़ी मय-ख्वार बैठे हैं
कहे हैं सबर किस को ? आह ! नंग[disgrance]-ओ-नाम[respect] है क्या शै
ग़रज़ रो पीट कर इन् सबको, हम यक बार बैठे हैं
कहीं बोसे की मत जुर्रत दिला बैठियो उंनसे
अभी इस हद को वो काफ़ी नहीं होशियार बैठे हैं
नजीबों का अजाब कुछ हाल है इस दौर में, यारो !
जिसे पूछो, यही कह्ते हैं, हम बेकार बैठे हैं
नई यह वज़ा[style] शरमाने की सीखी आज है तुमने
हमारे पास, साहब ! वरना, यूँ सौ बार बैठे हैं
कहाँ गर्दिश फलक की चैन देती है, सुना 'इंशा'
ग़नीमत है की हम-सूरत यहाँ दो चार बैठे हैं
nikala mujhko zannat se fareb-e-zindgi de kar.............. diya phir shaunq zannat ka ye hairani nahi jaati.......
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Thursday, June 4, 2009
insha allah khan ki shayyiri
छेड़ने का तो मज़ा तब है कहो और सुनो
बात में तुम को ख़फा हो गए, लो और सुनो
तुम कहोगे जिसे कुछ, क्यूँ न कहेगा तुमको
छोड़ देवेगा भला, देख तोह लो, और सुनो
यही इन्साफ है कुछ सोचो तो अपने दिल में
तुम तो सौ कह लो मेरी एक न सुनो और सुनो
आफरीन तुमपे, यही चाहिए शाबाश तुम्हें
देख रोता मुझे यूँ हंसने लगो और सुनो
बात मेरी नहीं सुनते जो अकेले मिल कर
ऐसे ही ढब से सुनाऊं के सुनो और सुनो
बात में तुम को ख़फा हो गए, लो और सुनो
तुम कहोगे जिसे कुछ, क्यूँ न कहेगा तुमको
छोड़ देवेगा भला, देख तोह लो, और सुनो
यही इन्साफ है कुछ सोचो तो अपने दिल में
तुम तो सौ कह लो मेरी एक न सुनो और सुनो
आफरीन तुमपे, यही चाहिए शाबाश तुम्हें
देख रोता मुझे यूँ हंसने लगो और सुनो
बात मेरी नहीं सुनते जो अकेले मिल कर
ऐसे ही ढब से सुनाऊं के सुनो और सुनो
Tuesday, June 2, 2009
insha allah khan ki shayyiri
कल चौदहवीं की रात थी शब् भर रहा चर्चा तेरा
कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा
हम भी वहीं मौजूद थे हमसे भी सब पूछा किए
हम हँस दिए हम चुप रहे मंजूर था परदा तेरा
इस शहर में किस से मिलें हमसे तो छूटी महफिलें
हर शख्स तेरा नाम ले हर शख्स दीवाना तेरा
कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएँ मगर
जंगल तेरे परबत तेरे बस्ती तेरी सेहरा तेरा
हम और रस्म-ए-बंदगी आशुफ़्तगी उफ्तादगी
एहसान है क्या क्या तेरा ऐ हुस्न-ए-बेपरवाह तेरा
दो अश्क जाने किस लिए पलकों पे आ कर टिक गए
अल्ताफ की बारिश तेरी इकराम का दरिया तेरा
ऐ बेदरेग-ओ-बे_अमां हमने कभी की है फुगाँ[complaint]
हमको तेरी वेह्शत सही हमको सही सौदा तेरा
हम पर ये सख्ती की नज़र हम हैं फकीर-ए-राहगुज़र
रास्ता कभी रोका तेरा दमन कभी थमा तेरा
हाँ हाँ तेरी सूरत हसीन लेकिन तू ऐसा भी नहीं
इस शख्स के अशआर से शोहारा हुआ क्या क्या तेरा
बेशक उसकी का दोष है कहता नहीं खामोश है
तू अब कर ऐसी दावा बीमार हो अच्छा तेरा
बेदर्द सुनी है तो चल कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल
आशिक तेरा रुसवा तेरा शायर तेरा 'इंशा' तेरा
कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा
हम भी वहीं मौजूद थे हमसे भी सब पूछा किए
हम हँस दिए हम चुप रहे मंजूर था परदा तेरा
इस शहर में किस से मिलें हमसे तो छूटी महफिलें
हर शख्स तेरा नाम ले हर शख्स दीवाना तेरा
कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएँ मगर
जंगल तेरे परबत तेरे बस्ती तेरी सेहरा तेरा
हम और रस्म-ए-बंदगी आशुफ़्तगी उफ्तादगी
एहसान है क्या क्या तेरा ऐ हुस्न-ए-बेपरवाह तेरा
दो अश्क जाने किस लिए पलकों पे आ कर टिक गए
अल्ताफ की बारिश तेरी इकराम का दरिया तेरा
ऐ बेदरेग-ओ-बे_अमां हमने कभी की है फुगाँ[complaint]
हमको तेरी वेह्शत सही हमको सही सौदा तेरा
हम पर ये सख्ती की नज़र हम हैं फकीर-ए-राहगुज़र
रास्ता कभी रोका तेरा दमन कभी थमा तेरा
हाँ हाँ तेरी सूरत हसीन लेकिन तू ऐसा भी नहीं
इस शख्स के अशआर से शोहारा हुआ क्या क्या तेरा
बेशक उसकी का दोष है कहता नहीं खामोश है
तू अब कर ऐसी दावा बीमार हो अच्छा तेरा
बेदर्द सुनी है तो चल कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल
आशिक तेरा रुसवा तेरा शायर तेरा 'इंशा' तेरा
Monday, June 1, 2009
Friday, May 29, 2009
insha allah khan ki shayyiri
अपने हमराह जो आते हो इधर से पहले
दस्त पड़ता है ,इयान सिहक में घर से पहले
चल दिए उठ के सू-ऐ-वफ़ा कू-ऐ-हबीब
पूछ लेना था किसी खाक़ बसर से पहले
इश्क पहले भी किया हिज़ा का ग़म भी देखा
इतने तडपे हैं न घबराए न तरसे पहले
जी बहलता ही नहीं अब कोई सा'अत कोए पल
रात ढलती ही नहीं चार पहर से पहले
हम किसी डर पे न ठिठके न कहीं दस्तक दी
सैंकडों दर थे मेरी जान तेरे दर से पहले
चाँद से आँख मिली जी का उजाला जागा
हमको सौ भार हुई सुबह सहर से पहले
दस्त पड़ता है ,इयान सिहक में घर से पहले
चल दिए उठ के सू-ऐ-वफ़ा कू-ऐ-हबीब
पूछ लेना था किसी खाक़ बसर से पहले
इश्क पहले भी किया हिज़ा का ग़म भी देखा
इतने तडपे हैं न घबराए न तरसे पहले
जी बहलता ही नहीं अब कोई सा'अत कोए पल
रात ढलती ही नहीं चार पहर से पहले
हम किसी डर पे न ठिठके न कहीं दस्तक दी
सैंकडों दर थे मेरी जान तेरे दर से पहले
चाँद से आँख मिली जी का उजाला जागा
हमको सौ भार हुई सुबह सहर से पहले
insha ji ki shayyiri
झूठा निकला करार तेरा
अब किसको है ऐतबार तेरा
दिल में सौ लाख चुटकियाँ ली
देखा बस हम ने प्यार तेरा
दम नाक में आ रहा था अपने
था रात ये इंतज़ार तेरा
कर जब्र जहाँ तलक तू चाहे
मेरा क्या, इख्तियार तेरा
लिप्टूं हूँ गले से आप अपने
समझूँ हूँ की है किनार तेरा
'इंशा' से मत रूठ मत ख़फा हो
है बंदा जानिसार तेरा
अब किसको है ऐतबार तेरा
दिल में सौ लाख चुटकियाँ ली
देखा बस हम ने प्यार तेरा
दम नाक में आ रहा था अपने
था रात ये इंतज़ार तेरा
कर जब्र जहाँ तलक तू चाहे
मेरा क्या, इख्तियार तेरा
लिप्टूं हूँ गले से आप अपने
समझूँ हूँ की है किनार तेरा
'इंशा' से मत रूठ मत ख़फा हो
है बंदा जानिसार तेरा
Friday, May 22, 2009
insha khan insha ki shayyiri
ख्याल कीजिये, कया काम आज मैंने किया
जब उनने दी मुझे गाली, सलाम मैंने किया
कहा यें सबर ने ... दिल से ..."कि लो खुदा हाफिज़"
"के हक-ए-बंदगी अपना, तमाम मैंने किया"
झिड़क के कहने लगे ... "लब चले बहुत अब तुम्हारे"[ज्यादा बोलना]
कभी जो भूल के उनसे, कलाम[बहस] मैंने किया
हवस[इच्छा] यह रह गयी, साहीब ने ... पर कभी ना कहा ...
"कि आज से तुझे,'इंशा' ... गुलाम मैंने किया"
*
जब उनने दी मुझे गाली, सलाम मैंने किया
कहा यें सबर ने ... दिल से ..."कि लो खुदा हाफिज़"
"के हक-ए-बंदगी अपना, तमाम मैंने किया"
झिड़क के कहने लगे ... "लब चले बहुत अब तुम्हारे"[ज्यादा बोलना]
कभी जो भूल के उनसे, कलाम[बहस] मैंने किया
हवस[इच्छा] यह रह गयी, साहीब ने ... पर कभी ना कहा ...
"कि आज से तुझे,'इंशा' ... गुलाम मैंने किया"
*
Monday, November 24, 2008
insha allah khan ki shayyiri
ये बातें झूठी बातें हैं, जो लोगो ने फेलाई हैं
तुम "इंशा" जी का नाम ण लो, कया "इंशा" जी सौदाई हैं !
हैं लाखो लोग जमाने मैं, क्यूं इश्क है रुसवा बेचारा
हैं और भी वजहें वहशत की, इंसान को रखती दुखियारा
हाँ ! बेकल बेकल रहता है, हो प्रीत मैं जिस ने दिल हारा
पर शाम से लेकर सुबह तक, यूँ कौन फीरे है आवारा !
गर इश्क किया है तो कया है, क्यूं शाद नहीं आबाद नहीं !
जो जान भी उफ्वाद नहीं, जो जान लिए बिन ताल ण सके
ये ऎसी भी उफ्वाद नहीं, ये बात तो तुम भी मानोगे
वह किस नहीं, फरहाद नहीं, कया हिजर का दारु मुश्किल है !
कया वस्ल के लम्हे याद नहीं, जो हमसे कहो हम करते हैं
कया इंशा को समझाना है ! उस लड़की से भी हम कह लेंगे
ये कुछ और ज़माना है, या छोडो या तकमील करो
ये इश्क है या अफसाना ! ये कैसा गोरखा-धंधा है !
ये कैसा ताना-बाना है ! ये बातें झूठी बातें है
ये लोगो ने फेलाई हैं,,,,,,,,,
तुम "इंशा" जी का नाम ण लो, कया "इंशा" जी सौदाई हैं !
हैं लाखो लोग जमाने मैं, क्यूं इश्क है रुसवा बेचारा
हैं और भी वजहें वहशत की, इंसान को रखती दुखियारा
हाँ ! बेकल बेकल रहता है, हो प्रीत मैं जिस ने दिल हारा
पर शाम से लेकर सुबह तक, यूँ कौन फीरे है आवारा !
गर इश्क किया है तो कया है, क्यूं शाद नहीं आबाद नहीं !
जो जान भी उफ्वाद नहीं, जो जान लिए बिन ताल ण सके
ये ऎसी भी उफ्वाद नहीं, ये बात तो तुम भी मानोगे
वह किस नहीं, फरहाद नहीं, कया हिजर का दारु मुश्किल है !
कया वस्ल के लम्हे याद नहीं, जो हमसे कहो हम करते हैं
कया इंशा को समझाना है ! उस लड़की से भी हम कह लेंगे
ये कुछ और ज़माना है, या छोडो या तकमील करो
ये इश्क है या अफसाना ! ये कैसा गोरखा-धंधा है !
ये कैसा ताना-बाना है ! ये बातें झूठी बातें है
ये लोगो ने फेलाई हैं,,,,,,,,,
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