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Friday, June 5, 2009

muzaffar warsi ki shayyiri

यूँ एक पल मत सोच के अब क्या हो सकता है
एक लम्हे की ओट भी परदा हो सकता है
इन् आँखों के अन्दर भी दरकार हैं ऑंखें
चेहरे के पीछे भी चेहरा हो सकता है
कुछ रूहें भी चलती हैं बैसाखी ले कर
आधा शख्स भी पूरा क़द का हो सकता है
कंधे करीयल के हों और गठरी बुढिया की
बोझ उठा कर भी जी हल्का हो सकता है
मुझसे मिलकर भी वो मेरा हाल न पूछे
सावन भी क्या इतना सूखा हो सकता है
इतनी खामोशी भी अच्छी नहीं है लोगों
सन्नाटों से भी हंगामा हो सकता है
इस दुनिया में न_मुमकिन नहीं 'मुज़फ्फर'
दूध भी काला, शहद भी कड़वा हो सकता है

Friday, May 29, 2009

muzaffar warsi ki shayyiri

मेरी जुदाइयों से वो मिल कर नहीं गया
उसके बगैर मैं भी कोई मर नहीं गया
दुनिया में घूम-फिर के भी ऐसे लगा मुझे
जैसे मैं अपनी जात से बाहर नहीं गया
क्या खूब हैं हमारी तारीकी -
पसंदियाँ
जीने बना लिए कोई ऊपर नहीं गया
जुगराफिये ने काट दिए रास्ते मेरे
तारीख को गिला है के मैं घर नहीं गया
ऐसी कोई अजीब इमारत थी ज़िन्दगी
बाहर से झांकता रहा अन्दर नहीं गया
सब अपने ही बदन पे 'मुज़फ्फर' सजा लिए
वापस किसी तरफ़ कोई पत्थर नहीं गया

wel come