यूँ एक पल मत सोच के अब क्या हो सकता है
एक लम्हे की ओट भी परदा हो सकता है
इन् आँखों के अन्दर भी दरकार हैं ऑंखें
चेहरे के पीछे भी चेहरा हो सकता है
कुछ रूहें भी चलती हैं बैसाखी ले कर
आधा शख्स भी पूरा क़द का हो सकता है
कंधे करीयल के हों और गठरी बुढिया की
बोझ उठा कर भी जी हल्का हो सकता है
मुझसे मिलकर भी वो मेरा हाल न पूछे
सावन भी क्या इतना सूखा हो सकता है
इतनी खामोशी भी अच्छी नहीं है लोगों
सन्नाटों से भी हंगामा हो सकता है
इस दुनिया में न_मुमकिन नहीं 'मुज़फ्फर'
दूध भी काला, शहद भी कड़वा हो सकता है
nikala mujhko zannat se fareb-e-zindgi de kar.............. diya phir shaunq zannat ka ye hairani nahi jaati.......
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Friday, June 5, 2009
Friday, May 29, 2009
muzaffar warsi ki shayyiri
मेरी जुदाइयों से वो मिल कर नहीं गया
उसके बगैर मैं भी कोई मर नहीं गया
दुनिया में घूम-फिर के भी ऐसे लगा मुझे
जैसे मैं अपनी जात से बाहर नहीं गया
क्या खूब हैं हमारी तारीकी -पसंदियाँ
जीने बना लिए कोई ऊपर नहीं गया
जुगराफिये ने काट दिए रास्ते मेरे
तारीख को गिला है के मैं घर नहीं गया
ऐसी कोई अजीब इमारत थी ज़िन्दगी
बाहर से झांकता रहा अन्दर नहीं गया
सब अपने ही बदन पे 'मुज़फ्फर' सजा लिए
वापस किसी तरफ़ कोई पत्थर नहीं गया
उसके बगैर मैं भी कोई मर नहीं गया
दुनिया में घूम-फिर के भी ऐसे लगा मुझे
जैसे मैं अपनी जात से बाहर नहीं गया
क्या खूब हैं हमारी तारीकी -पसंदियाँ
जीने बना लिए कोई ऊपर नहीं गया
जुगराफिये ने काट दिए रास्ते मेरे
तारीख को गिला है के मैं घर नहीं गया
ऐसी कोई अजीब इमारत थी ज़िन्दगी
बाहर से झांकता रहा अन्दर नहीं गया
सब अपने ही बदन पे 'मुज़फ्फर' सजा लिए
वापस किसी तरफ़ कोई पत्थर नहीं गया
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