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Wednesday, April 15, 2009

bekas ki shayyiri

मैंने देखा है,
सफीने से निकलता माजी.

अकाबत के काले समंदर में,
उतरते उसके पावों को महसूस किया है
अपनी साँसों में तड़प पायी उसकी

मैंने देखा
कि वो समझा रहा था मेरे फर्दा को,
मेरे कल को जो आनेवाला है,
कि आदत है इस शख्स को
गम उठाने की
मैंने देखा है
कि तबस्सुम के सफीने से निकल कर
मेरा माजी मेरे फर्दा से मिल गया है
मेरे कल को गमजदा करने से लिए,

और सोचा है,
कि अगर मेरा कल आ गया
तो मेरा माजी,
मुझे,
जीने नहीं देगा......... Bekas

bekas ki shayyiri

शाम होते ही खुद को परवाना बना देता हूँ,
हूँ वो मैकश कि घर को मैखाना बना देता हूँ.
होश में रहता हूँ तो अपनों से भी लड़ बैठूं,
पीकर तो रकीबों का याराना बना देता हूँ,
जाहिल हुआ हूँ बेकस लेकिन एक फन तो है,
मैं जिस से मिलता हूँ, दीवाना बना देता हूँ..........

Monday, April 13, 2009

bekas ki shayyiri

जब न आएगी दीवाने की सदा आज के बाद,
कौन पूछेगा तेरे घर का पता आज के बाद।
कैस पूछेगा असीरी क्या है बतला फ़िर तो,
कौन मानेगा मुहब्बत को खुदा आज के बाद।
मैं न रहूँगा तो गुलों मत खिलना तुम भी,
कौन आयेगा ऐ चमन तू बता आज के बाद।
आँख पुरनम है रहेगी ये सहर तक बस,
फिर न बरसेगी तबस्सुम की घटा आज के बाद।
यूँ तो आयेंगे कई तुझसे मिलने लेकिन,
वो न मानेंगे तेरे दर को खुदा आज के बाद।
माना दिलकश है सफर तनहा रातों का
गर न आए इस शब् की सबा आज के बाद।
ग़म है बेकस कि तुझे जाना है फ़िर भी,
तुझको ढूंढेंगी बिना दर की वफ़ा आज के बाद........।

bekas ki shayyiri

इतराई हुई कलियों की तरह,
इतराया हुआ सा रहता हूँ,
अलसाया हुआ सा रहता हूँ
मैं तनहा रातों की तरह,
आशिक की बातों की तरह,
भरमाया हुआ सा रहता हूँ,

मैं एक ग़ज़ल का हिस्सा हूँ,
शायर की जुबां से फिसल गया,
मस्जिद की किसी आयत की तरह,
दोहराया हुआ सा लगता हूँ,

घबराया हुआ सा रहता हूँ,
गहनों में सजी दुल्हन के हसीं,
घूंघट में छुपे चेहरे की तरह
शरमाया हुआ सा लगता हूँ,
शरमाया हुआ सा रहता हूँ,

इठलाया हुआ सा रहता हूँ,
नदिया के जवां धारे की तरह,
साहिल की तरह में धारे से,
टकराया हुआ सा रहता हूँ,

यादों के किसी खिलोने से,
मुफलिस के किसी बच्चे की तरह,
बहलाया हुआ सा रहता हूँ,
मन्दिर की किसी मूरत की तरह
ठहराया हुआ सा रहता हूँ,
तरसाया हुआ सा रहता हूँ,
मैकश की तरह साकी के लिए,
आधे की तरह बाकी के लिए,
तड़पायाहुआ सा रहता हूँ,

इंसान हूँ में भगवान् नही,
बेकस मैं अपनी सूरत से
घबराया हुआ सा लगता हूँ,
घबराया हुआ सा रहता हूँ,

Tuesday, March 31, 2009

bekas ki shayyiri

मैंने देखा है,
सफीने से निकलता माजी.

अकाबत के काले समंदर में,
उतरते उसके पावों को महसूस किया है
अपनी साँसों में तड़प पायी उसकी

मैंने देखा
कि वो समझा रहा था मेरे फर्दा को,
मेरे कल को जो आनेवाला है,
कि आदत है इस शख्स को
गम उठाने की
मैंने देखा है
कि तबस्सुम के सफीने से निकल कर
मेरा माजी मेरे फर्दा से मिल गया है
मेरे कल को गमजदा करने से लिए,

और सोचा है,
कि अगर मेरा कल आ गया
तो मेरा माजी,
मुझे,
जीने नहीं देगा.........

bekas ki shayyiri

जब न आएगी दीवाने की सदा आज के बाद,
कौन पूछेगा तेरे घर का पता आज के बाद।

कैस पूछेगा असीरी क्या है बतला फ़िर तो,
कौन मानेगा मुहब्बत को खुदा आज के बाद।

मैं न रहूँगा तो गुलों मत खिलना तुम भी,
कौन आयेगा ऐ चमन तू बता आज के बाद।

आँख पुरनम है रहेगी ये सहर तक बस,
फिर न बरसेगी तबस्सुम की घटा आज के बाद।

यूँ तो आयेंगे कई तुझसे मिलने लेकिन,
वो न मानेंगे तेरे दर को खुदा आज के बाद।

माना दिलकश है सफर तनहा रातों का
गर न आए इस शब् की सबा आज के बाद।

ग़म है बेकस कि तुझे जाना है फ़िर भी,
तुझको ढूंढेंगी बिना दर की वफ़ा आज के बाद........।

bekas ki shayyiri

jab na aayegi deewane ki sada aaj ke baad,
kaun puchhega tere ghar ka pata aaj ke baad.

kais puchhega asiri kya hai batla phir toh,
jaun maanega muhbbat ko khuda aaj ke baad.

main na rahunga toh gulon mat khilna tum bhi,
kaun aayega ae chman tu bata aaj ke baad.

aankh purnam hai rahegi ye sehar tak bas,
phir na barsegi tabssum ki ghata aaj ke baad.

yun toh aayenge kai tujhse milne lekin,
vo na manege tere dar ko khuda aaj ke baad.

mana dilkash hai safar tanha raaton ka,
gar na aaye iss shab ki saba aaj ke baad.

gham hai "bekas" ki tujhe jana hai phir bhi,
tujhko dhundhegi bina dar ki waffa aaj ke baad........।

wel come