आता है किस अंदाज़ से टूक, नाज़ तो देखो
किस धज से कदम पड़ता है, अंदाज़ तो देखो
करता हु मैं दुज्दीदा नज़र, गर कभी उस पर
नज़र मैं परख ले है, बाज तो देखो
मैं कंगूरा-ये- अर्श से, पर मार ke गुज़रा
अल्लाह रे रसाई-ये-परवाज तो देखो
अबतार है ये दीवान तो मियाँ 'मुसहफी' सारा
अंजाम को कया कहते हो, आगाज तो देखो
nikala mujhko zannat se fareb-e-zindgi de kar.............. diya phir shaunq zannat ka ye hairani nahi jaati.......
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Sunday, June 7, 2009
Saturday, May 30, 2009
mussahfi ki shayyiri
आता है किस अंदाज़ से टूक नाज़ तो देखो
किस धज से क़दम पड़ता है अंदाज़ तो देखो
करता हूँ मैं दूज_दीदा नज़र गर कभी उस पर
नज़रों में परख ले है नज़र_बाज़ तो देखो
मैं कन्गुरा-ऐ-अर्श से पर मार के गुज़ारा
अल्लाह रे रसाई मियाँ 'मुस्सह्फी' सारा
अंजाम को क्या कह्ते हो आगाज़ तो देखो
किस धज से क़दम पड़ता है अंदाज़ तो देखो
करता हूँ मैं दूज_दीदा नज़र गर कभी उस पर
नज़रों में परख ले है नज़र_बाज़ तो देखो
मैं कन्गुरा-ऐ-अर्श से पर मार के गुज़ारा
अल्लाह रे रसाई मियाँ 'मुस्सह्फी' सारा
अंजाम को क्या कह्ते हो आगाज़ तो देखो
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