रहम ऐ ग़म-ए-जानां बात आ गई याँ तक
दस्त-ए-गर्दिश-ए-दौराँ और मेरे गरेबान तक
कौन सर बा_काफ होगा, जशन-ए-दार क्या होगा
जोक-ए-सरफरोशी है एक दुश्मन-ए-जाँ तक
हमसफीर फिर कोई हादसा हुआ शायद
इक सजब उदासी है गुलसितां से ज़िन्दाँ तक
हमनशीं बहारों ने कितने आशियन फूंके
हम तो कर ही क्या लेते, सो गए निगेहबान तक
इक हम ही लगायेंगे खार-ओ-खास को सीने से
वरना सब चमन में हैं, मौसम-ए-बहाराँ तक
मेरे दस्तक-ए-वहशत को आज रोक लो वरना
फासिला बहुत कम है हाथ से गरेबान तक
है ‘शमीम’ अज़ल ही से सिलसिला मुहब्बत का
हल्का-ए-सलासिल से गेसू-ए-परेशां तक
nikala mujhko zannat se fareb-e-zindgi de kar.............. diya phir shaunq zannat ka ye hairani nahi jaati.......
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Thursday, June 4, 2009
Friday, May 29, 2009
shamim jaipuri ki shayyiri
तेरा जलवा निहायत दिल_नशीं है
मुहब्बत लेकिन इससे भी हसीन है
जूनून की कोई मंजिल ही नहीं है
यहाँ हर गाम, गाम-ऐ-अव्वलीं है
सुना है यूँ भी अक्सर ज़िक्र उंनका
की जैसे कुछ ताल्लुक ही नहीं है
मसीहा बन के जो निकल थे घर से
लहू में तर उन्हीं की आस्तीन है
मैं राह-ऐ-इश्क का तन्हा मुसाफिर
किसे आवाज़ दूँ, कोई नहीं है
‘शमीम’ उसको कहीं देखा है तुमने
सुना है वो राग-ऐ-जान के करीं है
मुहब्बत लेकिन इससे भी हसीन है
जूनून की कोई मंजिल ही नहीं है
यहाँ हर गाम, गाम-ऐ-अव्वलीं है
सुना है यूँ भी अक्सर ज़िक्र उंनका
की जैसे कुछ ताल्लुक ही नहीं है
मसीहा बन के जो निकल थे घर से
लहू में तर उन्हीं की आस्तीन है
मैं राह-ऐ-इश्क का तन्हा मुसाफिर
किसे आवाज़ दूँ, कोई नहीं है
‘शमीम’ उसको कहीं देखा है तुमने
सुना है वो राग-ऐ-जान के करीं है
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