Showing posts with label मंज़र भोपाली. Show all posts
Showing posts with label मंज़र भोपाली. Show all posts

Saturday, May 30, 2009

manzar bhopali ki shayyiri

बे-अमल को दुनिया में राहतें नही मिलती
दोस्तों को दुआओं से ज़नतें नही मिलती
जो परिंदे आंधी का सामना नही करते
उन्को असमानों की रफा'आतें नही मिलती
इस नए ज़माने के आदमी अधूरे हैं
सूरतें तोह मिलती हैं सीरतें नही मिलती
आंसुओं का जालिम पर कुछ असर नही होता
मोतियों को इस दर से कीमतें नही मिलती
क्या खुशी सिमटेगी ज़िन्दगी के दमन से
आदमी को अब ग़म से फुरसतें नही मिलती
ज़िन्दगी का इक इक पल ग़म के पास गिरवी है
इस के साथ सहने की सा'आतें नही मिलती
अपने बल पे लड़ती है अपनी जंग हर पीढ़ी
नाम से बुजुर्गों के अज्मतें नही मिलती
इस चमन में गुल बू'ते खून से भी नहाते हैं
सब को ही गुलाबों की किस्मतें नही मिलती
शोहरतों पे इतर कर ख़ुद को जो खुदा समझें
मंज़र ऐसे लोगों की कुर्बतें नही मिलती

Thursday, April 30, 2009

manzar bhopali ki shayyiri

एक नया मोड़ देते हुए फिर फ़साना बदल दीजिये
या तो खुद ही बदल जाइए या ज़माना बदल दीजिये
तर निवाले खुशामद के जो खा रहे हैं वो मत खाइए
आप शाहीन बन जायेंगे आब-ओ-दाना बदल दीजिये
अहल-ए-हिम्मत ने हर दौर मैं कोह[पहाड़] काटे हैं तकदीर के
हर तरफ रास्ते बंद हैं, ये बहाना बदल दीजिये
तय किया है जो तकदीर ने हर जगह सामने आएगा
कितनी ही हिजरतें कीजिए या ठिकाना बदल दीजिये
हमको पाला था जिस पेड़ ने उसके पत्ते ही दुश्मन हुए
कह रही हैं डालियाँ, आशियाना बदल दीजिये

wel come