मंसूब थे जो लोग मेरी जिनदगी के साथ
अक्सर वही मिले बड़ी बेरुखी के साथ
यूँ तो मैं हंस पड़ा हूँ तुम्हारे लिए मगर
कितने सितारे टूट पड़े हैं इस इक हँसी के साथ
फुर्सत मिले तो अपना गिरेबाँ भी देख ले
ऐ ! दोस्त यूँ न खेल मेरी बेबसी के साथ
मजबूरीयों की बात चली है तो मय कहाँ
हमने पिया है जहर भी अक्सर ख़ुशी के साथ
चेहरे बदल बदल कर मुझे मिल रहे हैं लोग
इतना बुरा सलूक मेरी सादगी के साथ
इक सजदा-इ-खूलुस की कीमत फिजा-ऍ-खिलद
या रब ! मजाक़ ना कर मेरी बंदगी के साथ
"मोहसिन" करम की लय भी हो जिस में खलूस भी
मुझको गज़ब का प्यार है उस दुश्मनी के साथ....!!!!
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