Monday, November 24, 2008

mohsin ki shayyiri

मंसूब थे जो लोग मेरी जिनदगी के साथ
अक्सर वही मिले बड़ी बेरुखी के साथ
यूँ तो मैं हंस पड़ा हूँ तुम्हारे लिए मगर
कितने सितारे टूट पड़े हैं इस इक हँसी के साथ
फुर्सत मिले तो अपना गिरेबाँ भी देख ले
! दोस्त यूँ खेल मेरी बेबसी के साथ
मजबूरीयों की बात चली है तो मय कहाँ
हमने पिया है जहर भी अक्सर ख़ुशी के साथ
चेहरे बदल बदल कर मुझे मिल रहे हैं लोग
इतना बुरा सलूक मेरी सादगी के साथ
इक सजदा--खूलुस की कीमत फिजा--खिलद
या रब ! मजाक़ ना कर मेरी बंदगी के साथ
"मोहसिन" करम की लय भी हो जिस में खलूस भी
मुझको गज़ब का प्यार है उस दुश्मनी के साथ....!!!!

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