Wednesday, April 15, 2009

abdul asar hafiz ki shayyiri

हुस्न पाबंदे-रज़ा[आदेश में बंधा] हो मुझे मंज़ूर नहीं
मैं कहूँ तुम मुझे चाहो मुझे मंज़ूर नहीं
जिसने इस दौर के इंसान किये है पैदा
वही मेरा भी खुदा हो मुझे मंज़ूर नहीं
शर्ते-इजहारे-नदामत[हया] है, जो बख्शिश[दान] के लिए
ऐ जवानी के गुनाहो ! मुझे मंज़ूर नही
हश्र के दिन मुझे सच कहने कि तोफ़ीक[साहस] ना दे
कोई हंगामा बपा हो मुझे मंज़ूर नहीं
हुस्न वाले मेरे कातिल हैं यह दावा है मेरा
हुस्न वालों को सज़ा हो मुझे मंज़ूर नहीं
दोस्तों को भी मिले दर्द कि दौलत या रब !
मेरा अपना ही भला हो मुझे मंज़ूर नहीं
मुझको ऐ कातिबे-तकदीर ! तमाशा ना बना
इश्क चेहरे पै लिखा हो मुझे मंज़ूर नहीं
ऐ बुतों ! अधाधुंध मरे खल्के-खुदा[जनता]
और खुदा देख रहा हो मुझे मंज़ूर नहीं
मैकदा वालों कि खफगी ! अरे तौबा-तौबा
कोई खुश हो कि ख़फा हो, मुझे मंज़ूर नहीं

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