Wednesday, April 15, 2009

zubeen rahee ki shayyiri

में लीखु शाने करामत तेरी गोसे आज़म
काश मील जाये इज़ाज़त तेरी गोसे आज़म
सब से आला है बीलायत तेरी गोसे आज़म
दोनों आलम में है अज़मत तेरी गोसे आज़म
तुने अल्लाह की कुदरत से जीला-ऐ मुर्दे
तू है अल्लाह का कुदरत तेरी गोसे आज़म
ये मुझे माँ की दुआओं का असर लगता है
मील गई जो मुझे नीस्बत तेरी गोसे आज़म
इब्ने मरीयम सी जो बनती हुई हमसर देखी
बो करामत है करामत तेरी गोसे आज़म
बा खुदा मानी है मानी है बहुत शेताने
नहेरे दज़ला पे इबादत तेरी गोसे आज़म
खुद बा खुद मेरे बुलंदी ने कदम चूम लीये
हो गई जब से इनायत तेरी गोसे आज़म
बो तबंगर का तबंगर है ज़माने भर में
मील गई जीस को भी दोलत तेरी गोसे आज़म
फीक -रे उक्बा नहीं इस वास्ते राही को तेरे
दील के शीशे में है सूरत तेरी गोसे आज़म

No comments:

Post a Comment

wel come