Friday, May 22, 2009

unknown

खुदा हमको ऐसी खुदाई ना दे
कि अपने सिवा कुछ दिखाई ना दे
खतावार समझेगी दुनीया तुझे
अब इतनी भी ज्यादा सफाई ना दे
हंसो आज इतना कि इस शोर में
सदा सिस्कियिओं कि सुने ना दे
अभी तो बदन में लहू है बहुत
कलम छीन ले रौशनाई ना दे
मुझे अपनी चादर से यूँ धाँप लो
ज़मीं आसमान कुछ दिखाई ना दे
गुलामी को बरकत समझाने लगे
असीरों[birds] को ऐसी रिहाई न दे
मुझे ऐसी जन्नत नहीं चाहिए
जहाँ से मदीना दिखाई न दे
मैं अश्को से नाम-ए-मुहमद लिखूं
खुदा ऐसे एहसास का नाम है
रहे सामने पर दिखाई ना दे

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