बिखरते टूटते लम्हों को अपना हमसफ़र जाना
था इस राह में आख़िर हमें ख़ुद भी बिखर जाना
कवा के दोष पर बदल के टुकड़े की तरह हम हैं
किसी झोंके से पूछेंगे की है हमको किधर जाना
मेरे जलते हुए घर की निशानी बस यही होगी
जहाँ इस शहर में रौशनी देखो ठहर जाना
पस-ए-ज़ुल्मत कोई सूरज हमारा मुन्तजिर होगा
इसी एक वहम को हम ने चिराग-ए-रहगुज़र जाना
दयार-ए-खामोशी से कोई रह रह कर बुलाता है
हमें 'मखमूर' एक दिन है इसी आवाज़ पर जाना
No comments:
Post a Comment