Saturday, May 30, 2009

makhmoor ki shayyiri

बिखरते टूटते लम्हों को अपना हमसफ़र जाना
था इस राह में आख़िर हमें ख़ुद भी बिखर जाना
कवा के दोष पर बदल के टुकड़े की तरह हम हैं
किसी झोंके से पूछेंगे की है हमको किधर जाना
मेरे जलते हुए घर की निशानी बस यही होगी
जहाँ इस शहर में रौशनी देखो ठहर जाना
पस-ए-ज़ुल्मत कोई सूरज हमारा मुन्तजिर होगा
इसी एक वहम को हम ने चिराग-ए-रहगुज़र जाना
दयार-ए-खामोशी से कोई रह रह कर बुलाता है
हमें 'मखमूर' एक दिन है इसी आवाज़ पर जाना

No comments:

Post a Comment

wel come