Monday, June 1, 2009

Dr.naseem uz zafar ki shayyiri

ऐ ज़मीर-ए-आदमी तुझको खुदा जिंदा रखे
वो कहाँ मरते हैं जिनको कर्बला जिंदा रखे
जिंदगी की जंग में बाजू कट भी जाएँ तोः
हौसला बाकी मेरा, मुश्किल कुशा जिंदा रखे
मौत ये कह कर मेरी बाली से वापिस हो गई
तुम जियो जब तक अली-ए-मुर्तज़ा जिंदा रखे
साहिब-ए-नह्ज उल बलाघाह इतनी इल्तेजा है बस
तेरी बीती शाम में, लहजा तेरा जिंदा रखे
कब्र में रख कर मुझे अजीजों ने दुआ दी ये 'नसीम'
जाने वाले जा तुझे खाक--शिफा जिंदा रखे

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