वफ़ा की दास्ताँ छेडी कभी तुमने, कभी हमने
बा_तर्ज़-ए-दिलबरी[लुबहना] तुमने, बा_रंग-ए-आशकी हमने
निगार[adornment]-ए-शौक़ से बख्शी जिन्हें ताबंदगी[brightness] हमने
वोही जलवे, वोही आँखें, मगर क्या हो गया दिल को
नाजाने क्यूँ बदल डाला नाजा-ए-जिंदगी हमने
यही वीरान आँखें हैं, यही सुनसान राहें हैं
यहीं अक्सर जलाये हैं चिराग-ए-जिंदगी हमने
जुदाई का समां है आज तक अपनी निगाहों में
न कोई बात की तुमने, न कोई बात की हमने
किसी के जलवे हाय नौ-बा-नौ जब याद आए है
तो अश्कों से बुझाई है नज़रों की तशनगी हमने
वो कुछ कहने को थे हम पा गए, वो मुसकुरा उठे
कोई तो बात थी जो मुँह से छीन ली हमने
हमें मालूम है मजबूरियों की इंतिहा क्या है
के देखी है निगाह-ए-हुस्न की बेचारगी हमने
बस एक ज़ौक़-ए-नज़र पर नाज़ था वो भी नही बाक़ी
"हाफीज़" उनंके तगाफुल को ये दौलत सौंप दी हमने
No comments:
Post a Comment