Sunday, June 7, 2009

hasan ki shayyiri

मरती हुई ज़मीन को बचाना पारा मुझे
बादल की तरह दस्त मैं आना पड़ा मुझे
वो कर नही रहा था मेरी बात का यकीन
फिर यूँ हुआ की मर के देखाना पड़ा मुझे

भूले से मेरी सिम्त कोई देखता ना था
चेहरे पे एक ज़ख्म लगाना पड़ा मुझे
उस अजनबी से हाथ मिलाने की वास्ते
महफिल मैं सब से हाथ मिलाना पड़ा मुझे

यादें थीं दफ़न ऐसी की बद अज फरोख्त भी
उस घर की देख भाल को जाना पड़ा मुझे
उस बेवफा की याद दिलाता था बार बार
कल आइने पे हाथ उठाना पड़ा मुझे
ऐसे बिछड़ के उस ने तो मर जाना था 'हसन'
उस की नज़र मैं ख़ुद को गिराना पड़ा मुझे.

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