आतिश-ए-इश्क का शिकार हुए
हम पे कुछ राज़ आशकार हुए
कौन चाहे निकालना इनको
तीर जो दिल के आर पार हुए
वो भी घबरा रहे थे मिलने से
बे-हवास हम भी बार बार हुए
पगडियां गाम गाम बिकती हैं
अब तो ऐसै भी कारोबार हुए
एक हम ही से परदा क्या करना
तालिब-ए-दीद तो हज़ार हुए
झोलियाँ किस तरह भरे कोई
जब की दामन ही तार तार हुए
वो जो कल तोहमतें लगाते थे
आज रुसवा सर-ए-बाज़ार हुए
मेरे आँसू का ये असर है 'शाहब'
रेत के शहर लालाज़ार हुए
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