हमें आशकी में सच मिला
हमें जिन्दगी में सब मिला
मगर बेवफाई की आदतें
न तुझे मिलीं न मुझे मिलीं
उधर तू दुआ में लगी रही
इधर मैं दुआ में लगा रहा
पर मनतों से हजएतें
थी आरजू कभी साहिलों पे
तेरे साथ साथ हम चल सके
पर समन्दरों से इजाजतें
न तुझे मिलीं न मुझे मिलीं
जिस जिन्दगी की ख्वाहिशों में
सो रतजगों में सजूद किये
उस जिंदगी की बशरतें
हसरतों के दीयों को आग
कभी तुने दी कभी मैंने दी
मगर रौशनी की अलामतें
न तुझे मिलीं न मुझे मिलीं
न तो तेरे दर्द रुके कहीं
न मेरे ज़ख्म भरे कभी
सब्र-ओ-शुकर की हालतें
तेरी मंजिलें कहीं और थी
मेरी मंजिलें कहीं और थी
किसी एक सिमट की मुसाफतें
न तुझे मिलीं न मुझे मिलीं
तू ठहर गया किसी और के घर
मैं रुक गया किसी और के दर
मनपसंद सी चाहतें
हमारी पुर'खलूस नीयतों
से मंजिलें क्यूँ छीन गयी !
मुक़द्दरों से वजहातें
न तुझे मिलीं न मुझे मिलीं !
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