"वो अनपड़ था मगर उसने पढ़े लिखे लोगों से कहा
एक तस्वीर,काई खत भी हैं साहब आप की रद्दी मे"
"काई अजनबी तेरी राह मे,मेरे पास से यूँ गुजर गए
जिन्हे देखकर ये तड़प हुई,तेरा नाम ले के पुकार लूं"
"उसकी भी मजबूरियाँ हैं मेरी भी
रोज मिलते हैं पर घर मे बता नाही सकते"
"अभी अपने इशारों पर हमे चलना नाही आया
सड़क की लाल-पीली बत्तियों को कोण देखेगा"
"मई तमाम तारे उठा-उठा कार गरीबों मे बाँट दूँ
कभी एक रात वो आसमा का निज़ाम दे मेरे हाथ मे"
|| होठों पे मोहब्बत के फसाने नाही आते
साहिलों मे समनदर के खज़ाने नाही आते
पलकें भी चमक उठती हैं सोते मे हमारी
आँखों को अभी ख्वाब छुपाने नाही आते
दिल उजड़ी हुई सराय की तरह है
यहाँ लोग रात बिताने नाही आते
उड़ाने दो शोख परिंदों को शोख हवाओं मे
फिर लौट के बाकपन के जमाने नाही आते
इस शहर के बादल तेरी जुल्फों की तरह हैं
ये आग लगाने आते हैं भूझने नाही आते
अहबाब भी गैरों की अदा सीख गए हैं
आते हैं मगर दिल को दुखाने नाही आते ||
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