" ना जाने क्यूँ "
चाँद भी था खामोश
चाँदनी भी थी गुमसुम
बेवजह की बात पर
चुप थे हम और चुप थे तुम ...
सूनी थी सारी रातें
सपने भी थे अलसाए
ना जाने किसकी खाता
समझे हम ना समझे तुम ...
फिर से सूखी थी शाखें
फिर से रूठा था मौसम
चलते - चलते बस यूँ ही
रूक गए हम और रूक गए तुम...
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