Friday, May 29, 2009

unknown

जानता हूँ मैं तुमको पा नहीं सकता
किस कदर मायूस हूँ बता नहीं सकता
नज़र आता है आईनों में तेरा अक्स
तेरी सूरत को मैं भुला नहीं सकता
तेरे आने की आखिरी उम्मीद है ये
इस शम्मा को मैं बुझा नहीं सकता
आंखों में गम के साए बैठे हैं
ज़ख्म दिल के मैं छुपा नहीं सकता
ग़मों को ज़बान दे बैठा हूँ मैं
खुशियाँ तुमको मैं अपनी नहीं दे सकता
जल जायेंगे मेरे ख्वाब इंनके साथ
मैं तेरे खतों को जला नहीं सकता
मेरी आंखों से पढ़ लो मेरी दास्ताँ
मुझपे क्या गुजरी मैं सूना नहीं सकता
मुझको ऐसे देखो दिल की ख्वाहिशों
अब मैं तुमसे नज़र मिला नहीं सकता
ज़िन्दगी अपने दम पे चल सके तोह चल
में तेरा भोज अब उठा नहीं सकता

No comments:

Post a Comment

wel come