अजीब हिजर_परस्ती थी उसकी फितरत में
शजर के टूटे पत्ते तलाश करता था
कयाम करता था वो मुझ में सूफियों की तरह
उदास रह के गोशे तलाश करता था
तमाम रात वो ज़ख्म दे के अपने पैरों को
मेरे वजूद के रेज़े तलाश करता था
दुआएँ करता था उजडे हुए मजारों पर
बड़े अजीब सहारे तलाश करता था
भुलाये कौन अजियात पसंदियाँ उसकी
खुशी के ढेर में सदमे तलाश करता था !
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