Saturday, May 30, 2009

unknown

फिर किसी याद ने रात भर है जगाया मुझको
क्या सज़ा दी है मुहब्बत ने खुदाया मुझको
दिन को आराम है न रात को है चैन कभी
जाने किस खाक़ से कुदरत ने बनाया मुझको
दुःख तोह यह है के ज़माने में मिले गैर सभी
जो मिला है वोह मिला बन के पराया मुझको
जब कोई भी न रहा कन्धा मेरे रोने को
घर की दीवारों ने सीने से लगाया मुझको
अब तोह उम्मीद-ऐ-वफ़ा तुमसे नहीं है कोई
फिर चरागों की तरह किस ने जलाया मुझको
बेवफा जिंदगी ने जब छोड़ दिया है तन्हा
मौत ने प्यार से पहलु में बिठाया मुझको
वोह दिया हूँ जो मुहब्बत ने जलाया था कभी
ग़म की आंधी ने सुबह और शाम बुझाया मुझको
कैसे भूलूँ तेरे साथ गुज़रे लम्हे
याद आता रहा जुल्फों का ही साया मुझको

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