दस्त-गुरबत में सदाक़त के ताहफुज़ के लिए
तुने जान दे के ज़माने को जिया बख्शी थी
ज़ुल्म की वादी-ए-खूनीं मैं क़दम रखा था
हक परस्तून को शहादत की अदा बख्शी थी
आतिश-ए-दहर को गुलज़ार बनाया तुने
तुने इन्सान की आज्मत को बका बख्शी थी
और वो आग वो ज़ुल्मत वो सितम के परचम
तेरे ईसार तेरे आज़म से शर्मिंदा हुए
जुर्रात-ओ-शौक-ओ-सदाक़त की तवारीख के बाब
तेरी आज्मत तेरे किरदार से ताबिंदा हुए
हो गया नज़र-ए-फ़ना दबदबा-ए-शिमर-ओ-याजिद
कश्तगान-ए-राह-ए हक मर के मगर जिंदा हुए
लेकिन ऐ सय्यद-ए-कोनैन हुसैन इब्न-ऐ-अली
आज फिर दहर में बातिल के सफ्फ़ आराई है
आज फिर हक के परिस्तारों का इनाम है दार
ज़िन्दगी फिर उसी वादी में उतर आई है
आज फिर मदद-ए-मुकाबिल हैं कई शिमर-ओ-याजिद
सिदक़ ने जिनको मिटने की कसम खाई है
दिल के हर साल तेरे ग़म मैं लहू रोते हैं
ये इसी एहद-ए-जूनून कैश की तजदीद तो है
जान बा कफ्फ़ हल्का-ए-अदा में जो दीवाने हैं
उनका मज़हब तेरे किरदार की तकलीद तो है
जब से अब तक इसी ज़ंजीर-ए-वफ़ा का रिश्ता
बियात-ए-दस्त-ए-जफा कार् के तरदीद तो है
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