Sunday, June 7, 2009

javed akhtar ki shayyiri

हमारे शौंक की ये इन्तहा थी
कदम रखा के मंजिल रास्ता थी
बिछड़ के डार से वन-वन(जंगल) फिरा वो
हिरण को अपनी कस्तूरी कजा थी
कभी जो खवाब था ! वो पा लिया है
मगर जो खो गई वो चीज़ क्या थी ??
मैं बचपन में खिलोने तोड़ता था
मेरे अंजाम की वो इब्तिदा(beginning) थी
मुहबत मर गई मुझको भी ग़म है
मेरे अच्छे दिनों की आशना(friend) थी
जिसे छू लूँ मैं वो हो जाए सोना
तुझे देखा तो जाना बद-दुआ थी
मरीज़-ए-खवाब को तो अब शफा(आराम) है
मगर दुनिया बड़ी कड़वी दवा थी !!!

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