हमारे शौंक की ये इन्तहा थी
कदम रखा के मंजिल रास्ता थी
बिछड़ के डार से वन-वन(जंगल) फिरा वो
हिरण को अपनी कस्तूरी कजा थी
कभी जो खवाब था ! वो पा लिया है
मगर जो खो गई वो चीज़ क्या थी ??
मैं बचपन में खिलोने तोड़ता था
मेरे अंजाम की वो इब्तिदा(beginning) थी
मुहबत मर गई मुझको भी ग़म है
मेरे अच्छे दिनों की आशना(friend) थी
जिसे छू लूँ मैं वो हो जाए सोना
तुझे देखा तो जाना बद-दुआ थी
मरीज़-ए-खवाब को तो अब शफा(आराम) है
मगर दुनिया बड़ी कड़वी दवा थी !!!
No comments:
Post a Comment