Friday, June 5, 2009

unknown

अक्ल को सोग मार देते हैं इश्क के रोग मार देते हैं
आप ख़ुद तो कोई नही मरता अरे दुसरे लोग मार देते हैं

कीजिये किस रस्ते गुन्दश्ता ज़न्नत की तलाश
जब के मट्टी के खिलोनो से बहल जाते है लोग

बाल बिखराये टूटी कब्रों पर जब कोई महजबीन रोती है
मुझको अक्सर ख्याल आता है अरे मौत कितनी हसीन होती है

ये लोग कह्ते है के परबत से निकल कर चश्मे
किसी खोयी हुई मंजिल का पता देते हैं
और सर शाम हवा ऊनके लिए चलती है
जिनके महबूब बोहत दूर कहीं रहते हैं

मुझे आजमाने वाले मुझे आजमा के रोये
मेरी दास्ताँ-ए-हसरत वो सुना सुना के रोये
कोई ऐसा अहल-ए-दिल हो फ़साना-ए-मुहब्बत
जिसे मैं सुना के रोऊं, मुझे वो सुना के रोये

जो सुने अंजुमन में शब्-ए-ग़म की आप बीती
मेरी कोई भी नही है जो गले लगा के रोये

मेरे पास से गुज़र कर मेरी बात तक न पूछी
मैं ये कैसे मान जाऊं के वो दूर जा के रोये

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wel come